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खर्च किए गए 47 हज़ार 634 करोड़ रूपए :नए अस्पताल -0 ,ऑक्सीजन प्लांट -0 -हम दिल्ली के मालिक हैं 

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खर्च किए गए 47 हज़ार 634 करोड़ रूपए :नए अस्पताल -0 ,ऑक्सीजन प्लांट -0 -हम दिल्ली के मालिक हैं

नई तरह की राजनीति करने , नहीं नहीं माफ़ करियेगा , गंदी हो चुकी राजनीति को बदलने के लिए आए कुछ लोग जो जनता को “जनलोकपाल ” बना कर सब कुछ स्वच्छ , साफ़ और स्पष्ट करने के लिए ख़ुद राजनीति में उतरते हैं और जल्दी ही धूर्तता , मक्कारी , भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण के खेल में इतने माहिर हो जाते हैं कि सत्ता की मलाई चाटना ही सिर्फ और एकमात्र अकेला उद्देश्य बच जाता है और वे इसी पर चलने लगते हैं।

पिछले पाँच छह वर्षों में देश और विदेश तक में , जहाँ तक हो सके अपनी अभूतपूर्व उपलब्धियों और नई योजनाओं के नाम पर अपना चेहरा चमकाने दिखाने में करोड़ों रूपए फूँक कर बताते दिखाते हैं कि किस तरह से दिल्ली की नई सरकार ने राजधानी की चिकित्सा और शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन करने के लिए कई नायाब प्रयोग किए , और न सिर्फ किए बल्कि खुद ही ये प्रमाणपत्र भी दे देते हैं कि आज तक न तो ऐसा कभी सोचा गया न ही कभी हुआ है।  देश विदेश से प्रोत्साहान और अनुदान बटोर कर वाहवाही पाती रहती है सरकार।

फिर आता है महामारी का समय और पिछले पाँच वर्षों में चिकित्सा व्यवस्था पर लगभग 48 हज़ार करोड़ रूपए खर्च किए जाने के बावजूद ये पता चलता है कि राजधानी दिल्ली वालों के लिए सरकार ने न तो एक भी नया अस्पताल बनवाया और न ही एक भी ऑक्सीजन प्लांट , नतीजा दिल्ली के लोग दवा , इलाज और साँस के चंद कतरे के लिए तरसने लगते हैं , मरते जाते हैं।

सरकार को अच्छी तरह पता होता है कि उसने क्या कितना और कहाँ ठीक या गड़बड़ी की है। फिर शुरू हो जाता है वही पुराना राग -मोदी , भाजपा और केंद्र सरकार को कोसने का काम , उन पर आरोप लगाने का काम ,उनसे दवाई , चिकित्सा उपकरण और ऑक्सीजन तक की माँग और न मिलने पर रोज़ रोज़ टेलीविजन पर आकर अपनी मजबूरी जाहिर करने ,रोने धोने का सिलसिला जो निर्बाध निरंतर अब भी चल रहा है।

अब लोग खुद अनुमान लगाएं कि , ईमानदारी , शुचिता की बात करके सत्ता तक पहुँच बना लेने वाले ये लोग उनसे भी ज्यादा खतरनाक और धूर्त निकले जो खुलेआम ये करके राजनीति में पहले से ही बदनाम रहे थे।  लोग कुछ नहीं भूलते मगर याद भी नहीं रखते हैं और इस पर भी लीपापोती हो ही जाएगी , लेकिन अब जब अगली बार दिल्ली सरकार बजट में हज़ारों करोड़ रूपए का प्रावधान रखे तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि -उनका पैसा कहाँ ,कैसे खर्च किया जाएगा ????

बागवानी के लिए जरूरी बातें -बागवानी मन्त्र

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#बागवानीमन्त्र :
आज बागवानी से जुड़ी कुछ साधारण मगर जरुरी बातें करेंगे।

बागवानी बहुत से मायनों में इंसानों  के लिए हितकर है , बल्कि बाध्यकारी भी है।  प्रकृति के साथ सहजीवन और सामंजस्य के लिए सबसे सरल साधन बागवानी ही है।  दायरा देखिए कि इंसान बाग़ बगीचे उगाएं इसके लिए प्रकृति कभी इंसाओं की मोहताज़ नहीं रही है उसे कुदरत ने ये नियामत खूब बख्शी हुई है।  तय हमें आपको करना है कि हम कितना और क्या क्या कर सकते हैं।

बागवानी घर , बाहर जमीन पर भी छत पर भी और बालकनी में भी।  बच्चे से लेकर बूढ़े तक और धनाढ्य परिवार से लेकर साधारण व्यक्ति तक कोई भी , कभी भी कर सकता है।  शौक के रूप में शुरू की गई बागवानी इंसान के लिए तआव ख़त्म करने का एक बेहतरीन विकल्प होने के कारण जल्दी ही आदत और व्यवहार में बदल जाती है।  बागवानी शुरू करने के सबसे आसान तरीकों में से एक ये की माली से गमले सहित अपेक्षाकृत आसान और सख्तजान पौधों से शुरआत करना बेहतर होता है जैसे -गुलाब , तुलसी , एलोवेरा , गलोय

बागवानी के लिए मिट्टी , बीज , पौधे , मौसम पानी इन सभी बिंदुओं पर थोड़ा थोड़ा सीखते समझते रहना जरूरी होता है।  मसलन पौधों में पानी देना तक एक कला है ,विज्ञान है और उसकी कमी बेशी से भी बागवानी पर भारी असर पड़  सकता है।  बागवानी विशेषकर अपने क्षेत्र (मेरा आशय मैदानी ,पहाड़ी या रेतीली ) को ध्यान में रखते हुए सबसे पहले वहां के स्थानीय , आसानी से उपलब्ध और उगने लगने वाले पौधों को लेकर शुरुआत करना श्रेयस्कर  रहता है।  मसलन -राजस्थान में बोगनवेलिया और महाराष्ट्र में अंगूर , बिहार में आम अमरूद , उत्तर प्रदेश में गेंदा गुलाब आदि।

बागवानी की इच्छा रखने मगर समयाभाव के कारण नहीं कर सकने वालों को पाम म क्रोटन , एलोवेरा , कैक्टस आदि और इनडोर पौधों से शुरुआत करना बेहतर रहता है क्यूंकि अपेक्षाकृत बहुत काम श्रम व् समय माँगते हैं  ये पौधे।  लम्बे समय तक हरियाली बनाए रखते हैं तथा बाहु के लिए बेहद लाभकारी होते हैं।  खिड़की व बालकनी में बागवानी करने के लिए बेलदार पौधों का भरपूर उपयोग करना बेहतर विकल है क्यूंकि इससे उनकी जड़ छाया में और बेल धूप  हवा में रह कर अच्छा विकास कर पाती है -जैसे मधुमालती ,अपराजिता आदि।

बागवानी में सिद्धहस्त होने तक पौधे उगाने लगाने से बचते हुए पहले से विकसित पौधों की देखभाल , खाद पानी डालना , काटना छांटना निराई गुड़ाई आदि धीरे धीरे सीख कर फिर खुद उगाने लगाने की शुरुआत करनी चाहिए।  यदि फिर भी खुद करने का मन कर ही रहा है तो फिर घरेलु बागवानी के लिए धनिया ा, पालक , मेथी आदि जैसे बिलकुल सहज  साग सब्जी से शुरू करना ठीक रहता है।

बागवानी में सबसे जरूरी होता है धैर्य और सबसे बड़ा सुख आता है अपने बोए बीज को अंकुरित ,पुष्पित -पल्ल्वित होते हुए देखना।  मिटटी के अनुकूल होने से लेकर पौधे के फूल फल आने की आहात तक एक खूसबूरत सफर जैसा होता है।  बागवानी धीरे धीरे मिटटी , पानी , बनस्पति , हवा , पक्षी और सुबह शाम तक से सबका परिचय करवाने का एक खूसबूरत माध्यम है।

नए पौधों को लगाने , उगाने और स्थानांतरित करने का सबसे उपयुक्त समय शाम का होता है।  गमलों के पौधों की जड़ों में पानी देना सुरक्षित रहता है और कई बार शीर्ष पर या कलियों , फूल आदि पर पानी पड़ने /डालने से नुकसानदायक हो जाता है।  बागवानी में सबसे ज्यादा अनदेखी हो जाती है जड़ों की निराई गुड़ाई।  जबकि वास्तविकता ये है की ,जड़ों की मिट्टी को ऊपर नीचे करके , निराई गुड़ाई नियमित पानी डालने से ही आप बागवानी का आधा और जरूरी दायित्व निभा लेते हैं।

विदेशी वैक्सीन का बाज़ार बनाने के लिए वैश्विक मीडिया कर रहा भारत को बदनाम 

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कल्पना करिये -एक तरफ भारत कोरोना की इस दूसरी और अधिक प्रलयकारी लहर से जूझ रहा था , शमशान और धरती जलती चिताओं से तप रही थी और आसमान लोगों की दारुण चीख पुकार से आहत , लेकिन ऐसे में भी कुछ लोग थे जिन्होंने अमानवीयता और हैवानियत की सारी हदें पार कर दी थीं।

ये वो लोग जिन्होंने भारत में जल्दी चिताओं , मौतों की तस्वीरों और समाचार पर भी व्यापार करने का घिनौना षड्यंत्र रचा और सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में रह रहे भारत के विरोधियों /शत्रुओं तक को इसमें शामिल कर लिया।  सोच कर देखिये कि विदेशी मीडिया ने भारत को बदनाम करने के लिए भारत की जलती चिताओं की जिन तस्वीरों को दिखाया उन्हें वहाँ तक पहुँचाने वालों को इस एवज में हजारों डॉलर और पाउण्ड का भुगतान किया गया।  उबकाई आ जाती है , वितृष्णा हो जाती है ये ख्याल भर मन में आते ही।  

अब धीरे धीरे ये राज़ भी खुलता जा रहा है कि जो पश्चिमी जगत और बाकी के अन्य देश कोरोना की पहली लहर में ही बुरी तरह से त्रस्त पस्त हो चुके थे वो सभी भारत जैसे विकासशील और तीसरी दुनिया के देश भारत का इन सबसे उबर जाना , न सिर्फ खुद बाहर आ जाना बल्कि , पूरी दुनिया के लिए दवाई , चिकित्सा सहायता करके संकटमोचन बन जाना और सबसे अधिक इतने कम समय में ही एक नहीं बल्कि दो दो -वैक्सीन की खोज कर लेना -आदि भारत की बढ़ती ताकत और कद को देख कर बुरी तरह से खीज उठा और उसे ये अनुमान हो चला था कि अब वो दिन लद गए जब भारत ऐसी असाधारण परिस्थतियों में भी किसी दूसरे देश पर निर्भर रहेगा और यहीं से शुरू हुई ये सारी साजिश और इसे अंजाम तक पँहुचने का काम।

भारत की विशालतम जनसंख्या , चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति और सबसे अधिक देश के अंदर ही देश को तोड़ने वाले गिद्ध से भी बदतर राजनेताओं के बावजूद भारत जैसे तैसे इन सबसे उबरने की कोशिश कर रहा था और पश्चिमी देशों के कुछ इन जैसे ही जो ऐसे ही अवसर पर भारत को अपने उत्पादोंका बाज़ार बनाने देने के मौके में रहते हैं उन्होंने इसे नया नज़रिया देना शुरू किया।

इण्डियन स्ट्रेन , बेकाबू कोरोना , मौतों के आंकड़ों , जलती चिताओं , वैक्सीन पर पहले सवाल उठा कर फिर वैक्सीन की कमी का हल्ला मचा कर ये सब सिर्फ और सिर्फ भारत में अपना व्यापार करने , उसे भुनाने के लिए किया जा रहा था।  देश में रहने वाली एक लॉबी भी इसके लिए सरकार पर दबाव बना रही थी।

और इसका असर अब दिखने भी लगा और सबको समझ भी आ रहा है।

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पश्चिम बंगाल -भारत का नया फिलिस्तीन

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तो आखिरकार वही सब हो रहा है जिसकी आशंका जताई जा रही थी और आशंका ही क्यों ममता के पिछले दस सालों में जिस तरह से बांग्लादेशी रोहिंग्यों की घुसपैठ करवा कर स्थानीय मज़लिमों के साथ एक जेहादी गठजोड़ तैयार किया गया था और उसे तरह तरह के (क्लब परिपाटी – पश्चिम बंगाल सरकार की एक योजना जिसके तहत स्थानीय युवाओं को मनोरंजन करने के नाम पर प्रति माह 5000 रुपए दिए जाते हैं और इन क्लबों में जुएबाजी , नशाखोरी से लेकर तमाम तरह के अपराधों की साजिश रचने का काम किया जाता है ) प्रलोभनों से तथा शासकीय संरक्षण में उन्हें इसी सब के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा था उसकी परिणति यही होनी थी।

बस थोड़ा सा पीछे जाकर एक मिनट को देखिये , सड़क पर चलते हुए मुख्यमंत्री ममता के कान में “जय श्री राम ” का नारा सुनाई देता है और वो सारी मर्यादा , नैतिकता , प्रशासनिक प्रमुख के पद की गरिमा को भूल कर किसी छुटभैये और टटपुँजिये नेता की तरह वहीँ अपना लाव लश्कर रोक न सिर्फ उनसे उलझ जाती हैं बल्कि उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी देती हैं।

दुर्गा पूजा में हज़ारों तरह के विघ्न और माँ भवानी की प्रतिमा विसर्जन पर भी सैकड़ों प्रशानिक बंदिशों का लगाया जाना , सिर्फ पिछले एक वर्ष में सैकड़ों हिन्दुओं का सरे आम क़त्ल , भाजपा राजनेताओं  से लेकर निरीह समर्थकों तक पर भयंकर अत्याचार , हिन्दुओं की संपत्ति , सम्मान को लूटा जाना आदि जैसी तमाम घटनाएं ये बताने के काफी हैं कि अब जबकि इस बार ममता ने इस चुनाव में अपनी जीत और हार को अपने अहं का प्रश्न बना लिया था तो फिर उनके जीतने के बाद , उनके विरोधियों से प्रतिशोध लेने और तृणमूल के अपने समर्थकों को बदला लेने की छूट देने का ही अंजाम है जो आज भारत के ये चरमपंथ से ग्रस्त होता राज्य हिन्दुओं के लिए नर्क सामान हो गया है।

भारतीय जनता पार्टी जो दूसरी बार देश में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने के बावजूद भी न तो दिल्ली और देश में मुजलिमों , कांग्रेसियों , वामपंथियों द्वारा किए गए बहुत बड़े षड्यंत्र से भड़के दंगों पर   सख्ती दिखा सकी और न ही पिछले एक साल से साजिशन दिल्ली और आसपास के राज्यों को बंधक बना कर उनमें अव्यवस्था और अराजकता फैलाते आढ़तियों को ही खदेड़ सकी।

और ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्यूंकि शासन और सत्ता में होते हुए भी एक नैतिकता के बोध का लबादा ओढ़े हुए “सबका साथ सबका विकास ” की अपनी नीति पर चलती रही।  और कई बार कमोबेश खुद भी उन्हीं सब तुष्टिकरण वाली राजनीतिक का शिकार हुई जो सालों से कांग्रेसी सरकारें करती चली आ रही थीं।

भारतीय जनता पार्टी को दो दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बावजूद भी जिस तरह से अधिकाँश गैर भाजपाई सरकार वाले राज्यों ने केंद्र सरकार , संघीय ढाँचे , संविधान में प्रदत्त व्यवस्थाओं को अपने ठेंगे पर रख दिया उसने निश्चित रूप से एक बहुत भद्दी और खतरनाक परिपाटी को जन्म दे दिया है।

दिल्ली , महाराष्ट्र , केरल , पश्चिम बंगाल अब धीरे धीरे ऐसे राज्यों की संख्या बढ़ती जा रही है जहां भाजपा सरकार , मोदी , योगी के विरोध को हिन्दुओं के प्रति नफरत फैला कर , उनका दमन शोषण करके अपना वोटबैंक पक्का करने के अचूक और आजमाए फार्मूले को अपनाया और बार बार आजमाया जा रहा है और वर्तमान हालातों में वे इसमें सफल भी हो रहे हैं।

आज फिर ममता बनर्जी एक मुख्यमंत्री होते हुए , केंद्रीय जाँच एजेंसी -CBI द्वारा नारदा घोटाले में लिप्त आरोपियों और अपने मंत्रियों की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह से छ घंटे तक उन्हें घेर कर बैठ गईं वो अपने आप में एक बहुत बड़ा अपराध है और ये और भी संगीन हो जाता है जब हज़ारों उपद्रवियों की भीड़ , जाँच अधिकारियों और पुलिस वालों पर उसी तरह से पथराव करती जैसे जम्मू कश्मीर में आतंकियों को बचाने के लिए वहाँ उनके समर्थक स्थानीय लोग किया करते थे।

इस पूरे परिदृश्य में , केंद्र सरकार का दृढ़ और सख्त रवैया न अपनाया जाना सबसे हताश कर भयभीत करने वाला रहा है।  और तो और शीर्ष नेतृत्व द्वारा दृढ़ता से इसका प्रतिरोध भी नहीं किया जाना बहुत ही दुखद है और ये आने वाले समय में अधिक हाहाकारी और विनाशकारी साबित होने वाला है।

सपा विधायक इरफान अपने समर्थक को छुड़ाने पहुंचा था थाने : योगी की पुलिस ने विधायक का ही चालान काट दिया

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इस कोरोना महामारी काल में भी , मोदी योगी और पूरी भाजपा सरकार से खार खाया विपक्ष अपनी घटिया राजनीति और ओछे पन से बाज नहीं आ रहा है उतना ही नहीं , कोरोना के समय में सरकार द्वारा जारी दिशा निर्देशों की जानबूझ कर अवहेलना करना , कानून को अपने हाथ में लेकर फसाद और विवाद करना एक प्रवृत्ति सी बनती जा रही है .

गैर  भाजपा शासित प्रदेशों में तो ये मनमानी अपने चरम पर है ही , जहाँ ये सत्त्ता में नहीन हैं  भी इनका यही हाल है . अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के नेता इरफ़ान ने अपने समर्थकों के साथ ऐसा ही कुछ उपद्रव करने की कोशिश की।

समाचारों के अनुसार , पुलिस ने विधायक के कुछ समर्थकों का कोविड नियमों का पालन नहीं करने और मास्क न लगा होने के कारण चालान कर दिया।  इससे नाराज़ होकर विधायक इरफ़ान थाने जाकर उलटा पुलिस वालों को ही उन्हें नौकरी से निकलवाने की धमकी देने लगा और उनसे मारपीट करने की कोशिश करने लगा।

पुलिस ने भी सख्ती दिखाते हुए , खुद विधायक इरफ़ान का ही 1000 का चालान करके सारे हेकड़ी निकाल दी।  ज्ञात हो कि योगी राज में कानून का डंडा इतना सख्त चल रहा है कि ऐसे तमाम फन्ने खान सकते में हैं।

दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का जिम्मेदार : अरविंद केजरीवाल

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कोई व्यक्ति देश और मोदी विरोध में इतना अंधा कैसे हो सकता है कि अपने साथियों के साथ मिलकर पूरी दुनिया के सामने , लोगों के सामने , टीवी रेडियो , अदालत तक के सामने रो रो और पानी पी पी कर केंद्र सरकार को कोसता है।  जो ऑक्सीजन , जो अस्पताल , जो दवाइयाँ पूरे देश को मिल रही हैं , दी जा रही हैं वो सब कुछ – सभी कुछ ही सिर्फ और सिर्फ दिल्ली को नहीं मिल रही है और उसके अभाव में लोगबाग मारे जा रहे हैं।  और फिर सच सामने आता है कि ये सब जानबूझ कर किया जा रहा है।

इस राजनैतिक दल से जुड़े हुए तमाम , नेता से लेकर उद्योगपति तक अपने घरों , होटलों , दफ्तरों में न सिर्फ ऑक्सीजन सिलेंडर का अनुचित भंडारण करते हैं बल्कि ऐसे समय में भी ज़िंदगी और मौत का सौदा करके पैसे बनाने में लगे हैं।  घिन्न आती है ऐसी सोच और ऐसी मानसिकता पर।  लोगबाग तिल तिल कर तड़पने कर मरने के लिए विवश किये जा रहे हैं।  इसकी कमी जानबूझ कर पैदा की जा रही है ?? 

और ये सब किसलिए -सिर्फ इसलिए की केंद्र सरकार को बदनाम किया जा सके , उस केंद्र सरकार को जिसने कोरोना के पहले प्रवाह से लेकर अब इस दूसरी लहर तक , खुद और सेना , अन्य सुरक्षा दलों के साथ मिल कर हमेशा ही दिल्ली को इस संकट से उबारा है।

जिस सरकार को छ माह पूर्व ही , इस त्रासदी के लिए संभावित तैयारी करने हेतु ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए पैसा और मंजूरी मिल गई थी वो सरकार , पूरे 250 करोड़ रूपए अपने उल जलूल विज्ञापनों पर फूँकती रही , देश और दुनिया को ये बताती रही कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी द्वारा स्थापित और संचालित मुहल्ला क्लीनिकों ने तो राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक चमत्कारिक परिवर्तन ला दिया है।  वो सरकार समय पड़ने पर ये कह कर हाथ खड़े कर देती है कि न ऑक्सीजन प्लांट है , न ही उन्हें आयात करने के लिए वाहन , और तो और उपलब्ध कराए गए ऑक्सीजन के भंडारण के लिए भी सरकार के पास कोई स्थान नहीं है।

अदालतें जो इन दिनों लगातार अपने अलग अलग निर्णयों और रुख से बार बार सब कुछ सुलझाने की बजाय उलटा अपने दंडात्मक रवैये से सब कुछ उलझाए बैठी है।  किसान आंदोलन पर कुछ और रुख तो , चुनावों पर कुछ और , ऑक्सीजन उपलब्धता पर कुछ और निर्णय तो टीकाकरण पर कुछ और।

आज कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने स्पष्ट शब्दों में दिल्ली के मुख्यमंत्री को पिछले दिनों कोरोना के कारण अस्पतालों में उत्पन्न अव्यवस्था कर ऑक्सीजन की कमी से मारे गए सभी लोगों की ह्त्या का जिम्मेदार ठहराते हुए केजरीवाल पर मुकदमा चला कर गिरफ्तार करने की माँग रखी है और यही बात आज एक आम दिल्ली वासी के मन में भी है।

केजरीवाल में किसी तरह की नैतिकता और ग्लानि गलती के बोध की अपेक्षा रखना बेमानी है किन्तु , ऐसे समय में लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करने वाले आम आदमी पार्टी के नेता और व्यापारी साथियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए ये बताने पूछने की जरूरत नहीं है। कुछ न हो सके तो इन्हें उन तमाम लोगों के हवाले कर दें जिनके परिजनों ने पिछले दिनों इनके अपराध के कारण अपनी जान से हाथ धो लिए।

 

पौधों की सिंचाई -बागवानी की एक खूबसूरत कला – बागवानी मन्त्र

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बागवानी के अपने पिछले 15  वर्षों से अधिक के अनुभव को साझा करते हुए मैंने पिछली पोस्टों में बताया था कि , बागवानी में मौसम , मिट्टी , गमले , पौधे और निराई गुड़ाई का क्या कितना कैसा उपयोग और महत्त्व है।  आप सबके प्रश्नों , जिज्ञासाओं , समस्याओं को पढ़ते समझते उन पर विमर्श करते बहुत कुछ सीख और समझ रहा हूँ।

चलिए साप्ताहिक पोस्ट में और बागवानी मन्त्र की इस कड़ी में हम आज बात करेंगे -सिंचाई की।  पौधों में पानी डालना।  लो बस इतने से काम के लिए क्या सीखना समझना ?? जो इस काम को इतना सा काम समझते हैं उनके लिए बस इतना ही कि , बागवानी में पौधों की देखभाल और समुचित विकास के लिए पानी डालना और वो भी संतुलित ,नियंत्रित और कायदे से डालना सबसे ज्यादा जरूरी है नहीं तो आपकी बागवानी का पूरा काम ही हो जाएगा।

हर पौधे , गमले , स्थान ,  (धूप और छाया का अनुपात , इनडोर पौधों में तो ये सबसे ज्यादा जरुरी है ) ,मिट्टी का प्रकार, पर निर्भर करता है कि पौधे की सिंचाई में पानी की मात्रा कितनी कम या ज्यादा रखनी होगी।  ये बहुत कठिन भी नहीं है , गमले की मिटटी में नमी बनी रहे , यही बुनियादी शर्त है और इसके लिए मिटटी की निराई गुड़ाई लगातार की जानी जरूरी होती है ताकि पानी नीचे तक पहुँच सके और जड़ों को देर तक जल पोषण मिलता रहे।

पानी देने का सर्वोत्तम समय – तेज़ , तीखी धूप को छोड़कर कभी भी। और पौधों की जरूरत के अनुरूप ही।  उदाहरण के लिए  दिल्ली में इस अत्यधिक गर्मी वाले मौसम में -चन्द्रकान्ति उर्फ़ संध्या के पौधे में मुझे चार चार बार पानी देना पड़ता है , और अक्सर मैं पौधों में रात को भी पानी डाल देता हूँ जो किसी भी तरह से बेहतर विकल्प नहीं होता ,मगर पौधों के जीवन को बचाने के लिए और सुबह तक पूरी तरह से झुलस जाने से बचाने के लिये ऐसा करना पड़ता है कई बार।  फिर भी अँधेरे में पौधों में पानी देने से यथासंभव बचना चाहिए।

पानी हमेशा जड़ों में डालना चाहिए , अक्सर ऐसा होता है कि पानी देने वाले खड़े खड़े सीधा पाइप लेकर पौधों की जड़ों में तेज़ धार से भी पानी डालते हैं जो ठीक नहीं होता।  पानी हमेशा गमले के बिलकुल करीब जाकर और झुककर डालें।  विशेष सावधानी ये कि , कलियाँ ,फूल , फल और पौधे के शीर्ष पर पानी नहीं डाला जाना चाहिए , यदि बहुत जरुरी लगे तो छिड़काव ही किया जाना चाहिए।

जिस तरह पानी की कमी पौधे के विकास और जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है ठीक वैसा ही दुष्प्रभाव पौधे की जड़ में पानी की अधिकता के कारण भी पड़ता है।  गमलों में बागवानी करने सहित क्यारी में बागवानी करने वालों को भी इस बात की सावधानी रखनी चाहिए।  अक्सर कई मित्र भूलवश गमलों में पानी की निकासी के लिए कोई छिद्र आदि बनाना या फिर उस गमले में मिटटी भरते समय उस छिद्र पर मिट्टी पूरी तरह आ कर उसे दबा न दे इसके लिए एक गिटक का इस्तेमाल नहीं करते हैं।  नतीजा पौधे की जड़ में गलन शुरू हो जाती है।

बहुत सारे कीटनाशक , उर्वरक आदि जो भी जल मिश्रित छिड़काव प्रणाली से दिए जाते हैं उनमें पानी के साथ उनका अनुपात और छिड़काव करते समय बरती जानी वाली सावधानियों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है।

मेरी छत पर बनी क्यारियों में पहले वर्ष इतना वर्षा जल संचयित हो गया गया कि , बहुत मुशिकल से पौधों की जान बचाई , सीलन का ख़तरा अलग बन गया।  फिर अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए क्यारियों में ड्रिलिंग करवा कर पाइप के टुकड़े लगवाए और ऊपर शेड्स भी।

आखिर में बस ये समझिये कि , पानी पौधों के लिए सबसे अच्छा टॉनिक है , भोजन तो है ही।  आज इतना ही , अपनी जिज्ञासा आप यहां साझा कर सकते हैं।  तो बागवानी करते रहिये और हमेशा हरे भरे रहिये।

बीमारी नहीं अव्यवस्था और बदहाली डरा रही है

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अभी बस कुछ दिनों पहले ही ऐसा लगने लगा था मानो , भारत इस कोरोना महामारी के चँगुल से अपेक्षित और अनुमानित नुकसान से कम झेलते हुए बाहर को निकल आया है और ये भी कि वर्ष 2020 के बीत जाने से भी सबको लगा था कि अब तो निश्चय ही हम धीरे धीरे उबर जाएंगे इस संकट से।

और ऐसा सोचने वाले विश्व में सिर्फ अकेले हम नहीं थे , इज़राईल , आस्ट्रेलिया , उत्तर कोरिया आदि बहुत सारे देश अपने यहाँ कोरोना महामारी को बिलकुल ख़त्म करके आगे की ओर बढ़ने की तैयारी में हैं।  मगर अचानक से इस महामारी के नए रूप ने एक बार फिर से देश और दुनिया में दहशत और मौत का ताण्डव शुरू कर दिया है।

हालाँकि पिछ्ले एक वर्ष पहले की स्थिति से तुलना करें तो हम बहुत बेहतर जानकारी और योजना के साथ अब इस बीमारी से निपटने में सक्षम हो चुके हैं।  इलाज के साथ साथ प्रतिरोधी टीकाकरण अभियान भी जोरों शोरों पर है।लेकिन इन सबके बावजूद भारतीय चिकित्सा व्यवस्था में किसी भी आपात स्थिति में उसका पूरी तरह से चरमरा जाना , बेबस , असहाय और लाचार हो जाना बीमारी से ज्यादा दुःखदाई हो जाता है।

इन हालातों  में अक्सर , अस्पतालों , बेड , गहन चिकित्सा केंद्रों , के साथ साथ जब ऑक्सीजन और इंजेक्शन तक की कमी और कालाबाज़ारी जैसी खबरें रोज़ , पल पल आम लोगों को देखने सुनने को मिलती हैं तो इस महामारी के माहौल में वो ज्यादा डराने और निराश करने वाला साबित होता है।

चिकित्सा को धंधा बना कर माफिया की तरह चलाने वाले कुछ व्यापारी चिकित्सक इन हालातों को अपने लिए लॉटरी निकलने जैसा समझ कर सारी नैतिकताओं को ताक पर रख कर बहुत कुछ अमानवीय और गैर कानूनी तक कर डालते हैं।  मृतक को भी गहन चिकित्सा केंद्र में रख कर लाखों रूपए का बिल बना देना , मृतक की देह उनके परिजनों को नहीं सौंपना , दवाई और अन्य ईलाज़ के अधिक पैसे लेना आदि सब कारनामे खूब किए जाते हैं और अब भी वही सब हो रहा है।

अफसोस ये है कि , हर आपदा की तरह इस आपदा की मार भी सबसे अधिक गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार लोगों को ही उठानी पड़ेगी और वो उठा ही रहा है।

झूठे दिलासे वाली : मौत की दहलीज़ पर खड़ी दिल्ली

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सुबह साढ़े आठ बजे ही फोन बजने लगता है।  इन दिनों हालात और हाल ऐसे हैं क़ी , असमय और अकारण ही किसी का भी नाम फोन पर चमकते ही एक अनजान सा डर फोन की रिंग के साथ धड़कने लगता है।

दूसरी तरफ से एक सहकर्मी की मरी मरी सी आवाज़ , सर छोटे भाई की मिसेज अस्पताल में भर्ती है कोई इंजेक्शन बता रहे हैं , वो कहीं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है।  कोई है आपका , मैं सर फोटो खींच कर भेजता हूँ।  कह रहे हैं ब्लैक हो रही है बहुत ही इफेक्टिव है इसलिए बाजार से गायब कराई जा रही है।

थोड़ी देर बाद , एक रिश्तेदार का फोन। ……पिताजी अस्पताल में भर्ती हैं परसों से ही , ऑक्सीजन लेवल बहुत कम चला गया था।  लेकिन न तो डाक्टर देखने आ रहा है न ही स्थिति में कोई सुधार है।  आप किसी से कहिए न , कोई है क्या मदद करने वाला ?????

आप कैसे मना कर रहे हैं ऐसे कि , कोई बेड खाली नहीं , एडमिट नहीं कर सकते , आपके एप्प पर तो देख कर ही आए थे और ये देखिये , देखिये अभी भी मोबाइल में खाली दिखा रहा है बेड। शोर बढ़ता जा रहा है और चीख पुकार भी।

आज कमोबेश पूरी दिल्ली का यही हाल हो गया है।  आज से ठीक एक साल पहले जब कोरोना महामारी ने अपने खूनी पंजे फैलाना शुरू किया था तब से लेकर अब तक यदि किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा तो वो है दिल्ली सरकार।  ज्यादा मामले बढे तो भाग कर पहुँच गए केंद्र सरकार के पास , और सँभलते ही अपना प्रचार प्रसार शुरू।

एक समय जब ऐसा लगाने लगा था कि कोरोना अब कम से कम भारत में तो लोगों को और अधिक डराने मारने में सफल नहीं हो पाएगा और ज़िंदगी दोबारा से पटरी पर लौटने लगी ही थी कि ऐसा लगा मानों को चार कदम पीछे हट कर दुगुने वेग से आठ कदम आगे आ गया है।  आज चारों तरह हाहाकार मचा हुआ है।

अस्पताल , डाक्टर , व्यवस्था , दवाइयाँ सब बेबस असहाय से होकर रह गए हैं और इन सबके बीच सबसे अधिक दुख दाई स्थिति उनकी है जो अपने इन राजनेताओं के बड़े बड़े वादों कर झूठे दिलासों के भरोसे बैठे रहे आज वो इसकी कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हैं।

आसान है सब्जियों की बागवानी : बागवानीमन्त्र

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बागवानी अक्सर फूल या बिना फूल के खूबसूरत पौधों के आकर्षण में शुरू की जाती है मगर फिर कब आपको इन फूल पौधों और गमलों की खाली पड़ी मिट्टी से एक स्नेह हो जाता है , एक रिश्ता जुड़ जाता है , ये आपको पता भी नहीं चलता .

फूलों के बाद अगली कोशिश , आम तौर पर फल उगाने की होती है या फिर साग सब्जी . बागवानी के अपने अनुभव के आधार पर कहूँ तो साग सब्जी उगाना बागवानी के कुछ सरलतम पाठों में से एक है .

अक्सर बागवानी में हाथ आजमाने वाले मित्रों को मेरा यही कहना होता है कि , जब खुद बागवानी शुरू करने का मन करे , मिट्टी में हाथ और खुरपी चलाने की हसरत हिलोरें मारने लगे तो , कुछ मत करिए , रसोई घर में घुसिए .

जितने भी जो भी साबुत मसाले , धनिया , लहसुन , मेथी , मिर्च ,और जाने क्या क्या सब कुछ एक एक चुटकी ले आइए और शुरू हो जाइये .

फल और फूल की तरह इनमें भी , ये बात कि गमला कैसा होना चाहिए ये इस बात पर निर्भर करता है कि , लगाया या बोया क्या जाना है . धनिया पालक मेथी चौलाई पुदीना आदि तमाम साग पात के लिए गमले चौड़े और मिर्च टमाटर प्याज लहसन आलू बैंगन के लिए गमले गहरे हों तो बहुत बेहतर रहता है .

सब्जियों की बागवानी की एक खूबसूरत बात ये है कि आप सालों भर कोई न कोई सब्जी लगाई जा सकती है और बहुत सारी सब्जियाँ तो वर्ष भर उगाई खाई जा सकती हैं .बस सावधानी ये रखनी है कि मौसम के अनुकूल और अनुसार ही सब्जियों की बागवानी की जानी चाहिए .

क्या एक छोटे परिवार के उपयोग लायक सब्जियाँ उगाई जा सकती हैं ??? -हाँ , बहुत आराम से . यदि नियोजित तरीके से बागवानी की जाए तो बहुत आसानी से ये किया जा सकता है . हाँ धूप , सब्जियों की खेती का एक महत्वपूर्ण और जरूरी तत्व है .मगर कम धूप में भी बहुत कुछ उगाया लगाया जा सकता है .

बीज , मिट्टी , खाद , गमले और उगाने , लगाने के सारे उपाय भी , सब कुछ यहीं अंतर्जाल पर सहज ही उपलब्ध है .ये समझिए की धान गेहूँ को छोड़कर सब कुछ उगाया लगाया जा सकता है और ये कोई भी कर सकता है .