

कुछ दिनों पूर्व छपी एक खबर के अनुसार , हाल ही में नई राष्ट्रीय महिला नीति के प्रस्तावित मसौदे में महिलाओं को त्वरित न्याय दिलवाने के उद्देश्य से विशेष अदालतें (जिन्हें “नारी अदालत “कहा जाएगा ) के गठन का सुझाव दिया गया है | सकारात्मक दृष्टिकोण से इस खबर के दो अच्छे पहलू हैं |पहला ये कि सरकार व प्रशासन समाज में महिलाओं की बदलती हुई स्थिति व परिदृश्य के कारण महिलाओं के लिए एक नई राष्ट्रीय नीति लाने को तत्पर हुई |और दूसरा ये कि अपने इस प्रयास में गंभीरता दिखाते हुए महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाने के उद्देश्य से उनके लिए विशेष अदालतों के गठन की कवायद |
एक नागरिक , और विशेषकर सरकारी मुलाजिम , इत्तेफाकन अदालत ही मेरा कार्यक्षेत्र होने के कारण भी , मेरी पहली और आख़िरी प्रतिक्रया यही होगी , कि , नहीं इससे कहीं कुछ भी नहीं बदलेगा , कुछ भी नहीं | कम से कम ये वो उपाय नहीं हैं जो अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल हो पायेंगे , विशेषकर तब जब आप सालों से उन्हें आजमा रहे हैं और दुखद स्थिति ये है कि दिनोंदिन महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध में क्रूरता का स्तर अब पहले से कहीं अधिक है और ये लगातार हर क्षण बढ़ रहा है | यूं किसी भी नए प्रयास या ऐसी किसी कोशिश का नकारात्मक आकलन उचित नहीं माना जाना चाहिए | मगर अफ़सोस यही है कि , प्रायोगिक रूप से ये परिणामदायक उपाय नहीं साबित होंगे |
जिस देश में जितने अधिक क़ानून होते हैं इसका मतलब उस देश का समाज उतना उदंड और कानून का द्रोही होता है .किसी विधिवेत्ता ने इसी बात को बखूबी ऐसे लिखा था | अब बात त्वरित अदालतों की संकल्पना की जो बहुत से कारणों की वजह से वैसा ही अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया जैसा विशेष अदालतों के मामले में हुआ है | और इसकी कुछ वजहें भी हैं | आसान भाषा में समझा जाए तो महिला अदालत , परिवार न्यायालय , हरित ट्रिब्यूनल , बाल न्यायालय …जैसी परिकल्पनाओं के पीछे एक जैसे विधिक विचार बिन्दुओं वाले वादों को एक विशेष न्यायालय में सुनवाई का अवसर देना , निस्तारण , सम्बंधित मशीनरी का बेहतर उपयोग और अन्य कई कारण , होता है | सरकार द्वारा संसद में इसका प्रावधान करते समय , प्रशासन की मंशा रहती है कि , विशिष्ट अदालतों और त्वरित अदालतों का गठन या स्थापना विशेष रूप से किया जाना चाहिए | किन्तु एक नई अदालत के लिए एक न्यायिक अधिकारी के साथ कम से कम दस कर्मचारी के पूरे सेट अप की अनिवार्य आवश्यकता का फौरी हल न होने के कारण , मौजूदा न्यायाधीशों व् कार्यरत कर्मचारियों में से ही एक तदर्थ व्यवस्था की जाती है | इसका परिणाम ये निकलता है कि इस नई विशेष अदालत की व्यवस्था स्थाई और सुचारू होने तक वो भी अन्य अदालतों के समान ही , अपनी पूरी शक्ति से कार्य करने के बावजूद भी , मुकदमों के बोझ से जूझती सी लगती हैं |
देश का वो तबका जो न्याय व्यवस्था के होते हुए भी लगातार शोषित होता रहा है उनमें दुनिया की आधी आबादी भी है , विडंबना है कि मेरे गृह जिले में १२ वर्ष की एक किशोरी को पारिवारिक दुश्मनी के शिकार के रूप में व्याभिचार के बाद हत्या और उसके शव को जला तक दिए जाने का नृशंश अपराध जब आंदोलित किये हुए है तो ये एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह देश की क़ानून व्यवस्था और खासकर अपराधियों के कभी भी कम न हो पाए मनोबल के लिए समाज याची से ज्यादा याचक बना दिखता है | यह नैसर्गिक न्याय के नियम के विरूद्ध है |
……देश की अदालतों में मुकदमों का बढ़ते बोझ के लिए व्यवस्था को अब बिलकुल अगल और नए सिरे से सोचना होगा
सड़क दुर्घटनाओं की खबरें अब नियमित रूप से समाचारों में देखने पढ़ने व सुनने को मिल जाती हैं | अफ़सोस और उससे अधिक चिंता की बात ये है की इन घटनाओं में लगातार इज़ाफ़ा ही हो रहा है | दो पहिआ वाहन से लेकर चार पहिया वाहन और भारी वाहन तक कोई भी इससे अछूता नहीं है | इत्तेफाक से जहाना केंद्र सरकार मोटर वाहन अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन कर चुकी है वहीं राजधानी की प्रदेश सरकार ने भी अभी कुछ समय पूर्व ही सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारणों का अध्ययन करके इसे दूर करने के लिए जरूरी उपाय समेत परिवहन परिचालन व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कई उपचारात्मक कदम उठाए हैं |
इस विषय पर आगे विमर्श से पहले कुछ तथ्यों कथ्यों पर नज़र डालते हैं | परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए दिशा निर्देश जारी करने के उद्देश्य से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति ने टिप्पणी करते हुए कहा था की इस देश में अपराध और आतंकी घटनाओं में उतने लोग नहीं मरते जितने कि सड़क दुर्घटनाओं में रोज़ मर रहे हैं | सड़क दुर्घटनाओं के कारण होने वाली मौतों के पीछे वजह का अध्ययन करने वाली संस्था “रोड एक्सीडेंट सेफ्टी मूवमेंट ” के सर्वेक्षण में यह बात सामने निकल कर आई है की भारत में ४७ प्रतिशत पीड़ितों की मृत्यु सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि समय पर उन्हें प्राथमिक उपचार नहीं मिल पाता |
पिछले दो दशकों में सड़क दुर्घटनाओं में लगातार वृद्धि होने के कुछ प्रमुख कारणों को रेखांकित किया जाए तो वे कुछ इस तरह सामने आते हैं | इन कारणों में सबसे पहला और सबसे मुख्य कारण खुद सड़कें हैं | भारतीय रोड रिसर्च संस्थान की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि मानक नियमों की अनदेखी रख रखाव व पुनर्निर्माण में लापरवाही तथा दिल्ली जैसे महानगरों में सडकों पर भागते वाहनों का दस गुना अधिक दबाव स्थिति को बेहद नारकीय बना रहा है | भारत जैसे देशों जहां परिवहन नियमों की अनदेखी के कारण एक्सप्रेस वे तथा विशेष कॉरीडोर में भी सड़क दुर्घटनाओं में काफी इज़ाफ़ा होता रहा है | दिली से सटे आगरा एक्सप्रेस वे तो इन सड़क दुर्घटनाओं के कारण कुख्यात सा हो गया है |
अगली बड़ी वजह है भारत में चलाए जा रहे व निर्मित वाहनों में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों की भारती अनदेखी | दुर्घटना के पश्चात पड़ने वाले प्रभाव व यात्रियों को उससे होने वाले नकसान के लिए किये गए एक परीक्षण में १० में से सिर्फ ३ ही वो भी आंशिक रूप से सफल रहीं | अन्य सात में चालाक व यात्रियों के बचने की संभावना बहुत कम रही | विडम्बना देखिये कि एक तरफ जहां नई स्कूटी मोटरसाइकिल में २४ घंटे अनवरत जलने वाली हेडलाईट का प्रयोग किया जा रहा है जबकि सर्दियों में धुंध बीच ड्राइविंग करने के लिए प्रयोग की जानी वाली विशेष पीली रौशनी हेड लाइट का प्रयोग न के बराबर होता है सर्दियों में धुंध व कोहरा सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण है |
भारत विश्व का अकेला ऐसा देश है जहां वाहन चलाने के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस की परिक्षा में १० प्रतिशत से भी कम लोग फेल होते हैं | अप्रशिक्षित चालकों को लाइसेंस मिल जाना व नकली लाइसेंस प्राप्त कर/बना कर वाहन चलाना जितना भारत में आसान है वो पड़ोस के छोटे देशों में भी नहीं है | इसका दुष्परिणाम ये हुआ आंकड़ों के अनुसार चालकों व बिना लाइसेंस या नकली लाइसेसं धारक चालाक व बिना लाइसेंस या नकली लाइसेंस धारक चालाक ही दोषी होते हैं | बस ट्रक टेम्पो आदि में तो कई बार बड़ी दुर्घटनाओं को अंजाम देने वाचालाक वास्तव में कंडक्टर व क्लीनर तक निकले हैं | महानगरों में बहुत काम उम्र में बहुत तेज़ गति से कार काऊंटी चलाते बच्चों ने तो मानो कहर बरपाया हुआ है | विदेश निर्मित वाहनों में असीमिति रफ़्तार की व्यवस्था वाली कारों आदि को भारत जैसे अधिक ट्रैफिक जनसंख्या वाले देश में दौड़ाना किसी बम से कम नहीं है |
दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कारकों में एक और मुख्य कारण है शराब पीकर गाड़ी चलाना | “शराब पीकर गाड़ी न चलाएं ” यह वाक्य लगभग हर सड़क और राजमार्गों पर लिखा होता है ,सिर्फ एक इस नियम के पालन से देश में दुर्घटनाओं की संख्या में ५० प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है | एक बात और उल्लेखनीय है कि ऐसे मामलों में चालक और पीड़ित के मौत की संभावना ७८ प्रतिशत तक अधिक हो जाती है 7 शराब पीकर वाहन चलाने वाले किसी आत्मघाती आतंकी की तरह होते हैं |
हालांकि ऐसा नहीं है की सरकार प्रशासन व पुलिस इससे चिंतित नहीं है या इनकी रोकथाम के लिए कोई उपाय नहीं कर रही है | मई २०१८ में दिल्ली की प्रदेश सरकार ने “दिल्ली सड़क सुरक्षा नीति ” को प्रस्तुत करते हुए जानकारी दी कि राजधानी दिल्ली में इस वक्त लगभग ११ करोड़ पंजीकृत वाहन हैं व प्रतिवर्ष ७ लाख नए वाहनों का पंजीकरण होता है | इसके बावजूद वर्ष २०११ से अब तक सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में मामूली ही सही मगर कमी तो आई है | इस नीति में २०१८ -२०२० तक इन दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या में ३० प्रतिशत तक और २०२५ तक ८० प्रतिशत की कमी उद्देश्य रखा गया है | इसके लिए सरकार ने विस्तृत कार्ययोजना बनाई है व समय समय पर इनकी समीक्षा व कार्यवाही रिपोर्ट भी ली जाएगी |
दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने अभी हाल ही में मोटर वाहन दुर्घटनाओं के लिए चालकों को अधिक सजग व सचेत करने के उद्देश्य से मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम में भारी संशोधन कर नियमों की अवहलेना करने के दोषियों पर अधिक जुर्माने व दंड का प्रावधान कर अपनी मंशा जाता दी है | किन्तु ये सभी उपाय, नियम तभी प्रभावी व सार्थक होंगे जब व्यक्ति खुद संवेदनशील व जिम्मेदार होगा | फिलहाल तो ये सड़कें मौत की मंज़िल बनी हुई हैं |
अगर आपका कोई भी मुकदमा/वाद अदालत में लंबित है तो आप अब उसकी जानकारी घर बैठे ही अपने कंप्यूटर या मोबाईल से प्राप्त कर सकते हैं | तकनीक के साथ हाथ मिलाते हुए न्यायालय प्रशासन ने इसके लिए बहुत सारे उपाय किए हैं | बहुत सारे नए एप्स व मोबाईल सेवा का उपयोग करके न सिर्फ मुक़दमे बल्कि अदालतों की ,न्ययाधीशों की ,वाद सूची ,फैसले आदेश आदि की पूरी जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं | संक्षेप में इस चित्र के माध्यम से बताया गया है | विस्तार से जानने व पढ़ने के लिए जुड़े रहें और किसी भी शंका सलाह सुझाव के लिए प्रश्न करते रहें.

जैसे जैसे ब्लॉगिंग की तरफ लौट रहा हूँ तो देख रहा हूँ कि हिंदी ब्लॉगिंग का प्रवाह सच में ही बहुत कम हो गया है | हालत ये है की पूरे दिन में यदि पचास पोस्टें भी नज़रों के सामने से गुज़र रही हैं तो उसमें से दस तो वही पोस्टें हैं जो इन पोस्टों के लिंक्स लगा रही हैं |
टिप्पणियों का हाल तो और भी खस्ता है | अधिकाँश पोस्टों पर सिर्फ यही देखने पढ़ने को मिल रहा है की आपकी पोस्ट का लिंक फलाना ढिमकाना में लगाया गया है आकर जरूर देखें | जबकि पोस्टों को चुनने सहेजने वाले ब्लॉगर मित्र खुद अपनी राय तक नहीं दे रहे हैं वहां |
समाचारों को ब्लॉग पोस्ट में चस्पा करके लगातार जाने कितनी ही पोस्टों का प्रकाशन किया जा रहा है | विषयवार सामग्री तलाशने वालों के लिए ये निश्चित रूप से निराश करने वाली बात है | सभी ब्लॉगर मित्र एक साथ धीरे धीरे ही सही प्रयास शुरू करें तो ये महत्वपूर्ण विधा फिर से अपनी रफ़्तार पकड़ लेगी मुझे पूरा यकीन है |
अपने स्तम्भ ब्लॉग बातें के लिए मुझे एक विषय पर गिन कर दस पोस्टें भी पढ़ने को नहीं मिलीं | फिलहाल मैं अपने इसी ब्लॉग झा जी कहिन पर चिट्ठा चर्चा (सिर्फ पोस्टों के लिंक्स नहीं ) शुरू करने जा रहा हूँ | जहाँ पोस्टों को पढ़ कर उनका विश्लेषण व चर्चा करूँगा , एक पाठक के रूप में एक ब्लॉगर के रूप में भी और ये काम बहुत जल्द शुरू करूंगा
आप तमाम मित्र मुझे अपने ब्लॉग के लिंक अपनी पोस्ट के लिंक और ब्लॉग से सम्बंधित कुछ भी मेरे मेल में ,मेरे फेसबुक पर ट्विट्टर कहीं भी थमा सुझा सकते हैं | इस विधा को दोबारा से अपनी रवानी में लाने के लिए निरंतर किए जाने वाले इस प्रयास में मुझे आप सबका साथ चाहिए होगा , आप देंगे न साथ मेरा
पिछले कुछ समय से न्यायपालिका से जिस तरह की खबरें निकल कर सामने आ रही हैं वो कम से कम ये तो निश्चित रूप से ईशारा कर रही हैं कि , न्यायपालिका की प्रतिबद्धता और जनता के बीच बना हुआ उनके प्रति विश्वास अब पहले जैसा नहीं रह पायेगा | रहे भी कैसे एक के बाद एक नई नई घटनाएं ,आरोप ,व जैसी जानकारियां निकल कर आम लोगों के बीच पहुँच रही हैं वो न तो न्यायपालिका के लिए स्वस्थ परम्परा साबित होगी न ही देश की व्यवस्था के लिए |


आखिर वो कौन से कारण हैं कि आज़ादी के बाद से अब तक लगातार मुकदमों में भी इज़ाफ़ा हो रहा है और उसी अनुपात में अपराधों में भी ??
इन मुकदमों को समाप्त किए जाने व भविष्य में इनकी संख्या को नियंत्रित किए जाने को लेकर न्याय प्रशासन ने अब तक क्या और कितना ठोस काम किया है ये खुद न्यायपालिका को बताना चाहिए
देश में खुद को ईमानदारी ,कर्तव्यपरायणता , प्रतिबद्धता का पर्याय कहने बताने वाली न्यायपालिका देश में एक भी ऐसी अदालत नहीं बना पाई जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो
न्यायपालिका में भी भाई -भतीजावाद ,भ्रष्टाचार , लालच ,कदाचार देश की किसी भी संस्था से रत्ती भर भी कम नहीं है और ये दिनों दिन बढ़ रहा है
अदालतें अब किसी तरह फैसला तो सूना रही हैं मगर न्याय करने व न्याय होने से वे कोसों दूर होती जा रही हैं
ऐसे बहुत सारे सवाल और मसले हैं जो सालों से न्यायपालिका के सामने उत्तर की बाट जोह रहे हैं
शिक्षकों के लिए कक्षा में दो ही विद्यार्थी पसंदीदा होते हैं अक्सर , एक वो जो खूब पढ़ते लिखते हैं और हर पीरियड में सावधान होकर एकाग्र होकर उन शिक्षकों की बात सुनते समझते हैं और फिर परीक्षा के दिनों में उनके तैयार प्रश्नपत्रों को बड़ी ही मेहनत से हल कर अच्छे अंकों से पास होते हैं | ये वाले बच्चे कक्षा दर कक्षा शिक्षकों के प्रिय और सर्व प्रिय हो जाते हैं | इनके अलावा एक दूसरे होते हैं वो जो किसी खेल कूद में ,किसी अन्य विधा जैसे चित्र कला संगीत वाद्य आदि में निपुण होते हैं वे भी कक्षा के अलावा पूरे स्कूल के भी प्यारे होते हैं | पहले वालों का खेल कूद आदि में बहुत कुछ न कर पाना माफ़ होता है और दूसरों वालों का पढ़ाई लिखाई में चलताऊ होना |

इनके अलावा जो तीसरे प्रकार के होते हैं जिनकी संख्या दोनों वाली श्रेणी से अधिक होती है वे भी प्यारे होते हैं मगर एक दूसरे के | मगर कभी कभी कोई शिक्षक या शिक्षिका अपने अलग अंदाज़ के कारण अलग ही बच्चों को अपना प्रिय बना लेते हैं और उससे अधिक वो उन बच्चों के प्रिय हो जाते हैं | ऐसी ही थीं हमारी आठवी कक्षा की एडगर मैम , उनका नाम क्या था न उस समय पता था न ही आज तक पता चला | मगर अंग्रेजी भाषा के कमज़ोर विद्यार्थी उन्हें डर के मारे अजगर मैम कह कर पुकारते थे | कक्षा आठ में पहला परिचय और पहला ही पीरियड इस अंगरेजी और एडगर मैम से हुआ | हमारा और उसमें भी मेरा विशेष रूप से इसलिए हुआ कि उन बच्चों ,जो कक्षा में जोर जोर से पढ़ने के डर के मारे पसीने पसीने हो जाते थे ,उन बच्चों में से एक बच्चा मैं भी था |
पहला सबक मिला एक डिक्शनरी खरीद कर अगले दिन से कक्षा में लाने का आदेश (डिक्शनरी अब तक मेरे पास है ,और अंग्रेजी से अंग्रेजी भाषा के शब्दार्थ वाली है ) फिर उसके बाद तो शायद ही कोई पीरियड ऐसा गुजरता हो जब बीच कक्षा में खड़े होकर ,जहाँ से मुझ से पहले वाले सहपाठी ने ख़त्म की वहीं से , पाठ को जोर जोर से पढ़ने का अनवरत अभ्यास | पहले पहल बड़े अक्षरों को एक बार में भी न पढ़ पाने ,उच्चारण का पूरा क्रिया कर्म कर डालने के कारण मनोरंजन का पात्र बने हम कब धीरे धीरे अंग्रेजी पढ़ने समझने और उसे बेहतर करने में पारंगत हुए पता ही नहीं चला | दसवीं कक्षा में आकर भी अंग्रेजी ने नहीं डराया जो हलकान किया वो कम्बख्त गणित ने ही किया |
असली कमाल तो शुरू हुआ कक्षा 11वीं में जहां इस गणित विज्ञान के चक्रव्यूह से निकल कर अपने पसंदीदा विषयों हिंदी अंग्रेजी इतिहास अर्थशास्त्र राजनीतिशास्र व मनोविज्ञान जैसे विषयों को पढ़ने समझने का मौक़ा मिला | ये एडगर मैम द्वारा पढ़ाए गए और उससे अधिक उनके द्वारा जगाए आत्मविश्वास का ही परिणाम था कि मेरे जैसा विद्यार्थी स्नातक में अँग्रेजी प्रतिष्ठा के साथ अपने महाविद्यालय में दूसरे स्थान पर उत्तीर्ण हो सका | आज भी मन ही मन मैं उनको बार बार प्रणाम करता हूँ और शायद ही कोई दिन जाता हो जब मैं उन्हें न याद करता होऊं | बच्चों को अपनी आठवीं कक्षा की वो डिक्शनरी दिखाते ही उनकी प्रतिक्रया देखने लायक होती है |
ये उन दिनों की बात थी
एक ही निगाह में ,वो सब बता गया
दर्द का पूछा तो ,मज़हब बता गया
अंदाज़ा मुझे भी इंकार का ही था
यक़ीन हुआ नाम गलत जब बता गया
हाथ मिलाया तो नज़रें जेब पर थीं
यार मिलने का यूं सबब बता गया
लूटता रहा गरीबों को ताउम्र जो
पूछने पर ख़ुद को साहब बता गया
वादे कमाल के किये उसने ,मुकरा तो
कभी उन्हें अदा ,कभी करतब बता गया
बता देता राज़ तो तमाशा ही न होता
खेल ख़त्म हुआ ,वो तब बता गया
कहते हैं कि संगत का असर बहुत पड़ता है और बुरी संगत का तो और भी अधिक | बात उन दिनों की थी जब हम शहर से अचानक गाँव के वासी हो गए थे | चूंकि सब कुछ अप्रत्याशित था और बहुत अचानक हुआ था इसलिए कुछ भी व्यवस्थित नहीं था | माँ और बाबूजी पहले ही अस्वस्थ चल रहे थे | हम सब धीरे धीरे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे और भरसक प्रयास कर रहे थे कि किसी तरह से सब कुछ बिसरा कर आगे बढ़ा जाए |
चूंकि शहर से अचानक आया था और तरुणाई की उस उम्र में वहां तब तक कोई दोस्त नहीं बन सका था | गाँव के बहुत से अनुज जिनमें बहुत से चचेरे भाई थे वे सब दोस्त की तरह होते जा रहे थे | गाँव में होने के बावजूद आदतन पहनवा आदि शहरी जैसा ही था | शर्ट को पैंट के अंदर रखना , बेल्ट लगाना , गाँव से बाहर जाते समय जूते पहनना | कुल मिलाकर कोई दूर से ही देख कर समझ सकता था कि हम ग्रामीण परिवेश से अलग हैं | यही बात उस समय गाँव के कुछ हमउम्र लड़कों को नहीं भा रही थी |
इनमें से एक युवक थे संजीव ,जिनके पिताजी उस समय गाँव के सबसे रसूखदार ,जमींदार और धनवान व्यक्ति थे | संजीव की परवरिश लाड प्यार से हुई थी और बोर्डिंग स्कूल आदि में भी रहे थे सो ज़ाहिर तौर पर बहुत अधिक शरारती , उद्दंड थे | छोटी छोटी बातों पर मारपीट कर लेना झगडा कर लेना उनकी आदत थी | हमारी निकटता की शुरुआत भी एक ऐसी ही झड़प से हुई जो मेरे लिए बिलकुल नई बात थी | संयोगवश संजीव के सबसे कनिष्ठ चाचा जी ,जिन्हें हम प्यार से भैया बुलाते थे , बात उन तक पहुँच गयी और उन्होंने संजीव को बहुत डाँट लगाई |
मगर असली कहानी तब शुरू हुई जब एक रात गाँव में पड़ी डकैती की घटना में उन भैया की ह्त्या कर दी गयी | पूरा गाँव उबाल खा गया और संजीव अब पहले से अधिक उग्र हो चुके थे | देशी कट्टे और जाने कैसे कैसे हथियार से लैस होकर बिलकुल दिशाहीन होकर पढ़ाई लिखाई त्याग कर एक अलग ही राह पर चल पड़े थे | अपने कुछ साथियों के साथ ही बिलकुल बिगड़ैल और असंतुलित | एक बहुत बड़ी दुर्घटना का शिकार भी और जान जाते जाते बची |
उनके चाचा और हमारे भैया के अचानक चले जाने के बाद हम दोनों के बीच का वैमनस्य जाता रहा | संजीव अब हमारे साथ ज्यादा समय गुजारते | हमारे मंडली में मैं और मेरे चचेरे अनुज समेत मेरे जैसे ही कुछ मित्र थे | हम शाम को बैठ कर बातें करते ,इधर उधर ,गाँव घर ,राजनीति ,समाज ,काली पूजा आदि की | धीरे धीरे संजीव ने अपने उन बिगड़ैल साथियों के साथ करीबी कम कर हमारे साथ नज़दीकी बढ़ा ली | चूंकि घर पर उनके लिए हमेशा चिंता बनी रहती थी सो हम भी यही कोशिश करते कि वो घर पर ज्यादा समय दें | हम खुद भी झिझकते हुए उनके घर पर जाने लगे | एक दिन संजीव के पिताजी (हमारे विद्या भैया ) ने कहा कि ,जब से संजीव आप लोगों के साथ समय बिताने लगा है मेरी चिंता उसको लेकर थोड़ी कम हो गई है | सच कहूं तो निश्चिंत सा रहने लगा हूँ | वो उनसे ज्यादा हमें संतोष देने वाली बात थी |
बाद में हम एक साथ काँवड़ लेकर वैद्यनाथ धाम जाते रहे तो कभी उनकी छोटी बहन के विवाह में हम सब संजीव के साथ कंधे से कन्धा मिला कर ऐसे डटे कि ग्रामीण भी भौंचक्के रह गए | उन दिनों उनके विवाह में जाने के लिए अपनी ज़िद पर वे हमारे लिए अलग से एक कार का इंतज़ाम कर बैठे | आज संजीव गृहजिले मधुबनी में एक रसूखदार भू व्यवसायी के रूप में स्थापित हैं | अपने छोटे से परिवार में दो सुपुत्रों के साथ पूर्ण गृहस्थ जीवन बिता रहे हैं | संजीव के बाबूजी हमारे विद्या भैया दस वर्षों तक गाँव के मुखिया रहे व अब संजीव की माता जी हमारे गाँव की मुखिया हैं |
संजीव की दिलेरी , साहस और जीवटता को यदि उस समय गलत दिशा में जाने से नहीं रोका जा पाता तो ये कहानी मैं आपको नहीं सुना पाता। ……… हाँ ये उन दिनों की बात थी