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वैकल्पिक विधिक उपचार बनाम न्यायिक व्यवस्था

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देश की तमाम संचालक व्यस्थाओं में आज किसी भी प्रकार से जो व्यवस्था अंततः केंद्र में आ ही जाती है वो है देश की न्यायिक व्यवस्था | अदालतों में न्याय हेतु याचिका दायर कर अपने मुकदमों के  निष्पादन की प्रतीक्षा करते देश के अवाम के लिए अदालतों को आज इससे भी अधिक करना पड़ रहा है | रोज़ सैकड़ों की संख्या में दाख़िल की जा रही जनहित याचिकाओं की बाढ़ से निपटने के अलावा अदालतें खुद भी बहुत बार संवेदनशील मामलों को देखते हुए स्वतः संज्ञान लेकर भी इन मुकदमों की संख्या में इज़ाफ़ा हो जाता है | यही कारण है कि अब प्रतिवर्ष बनाई और स्थापित की जा रही सैकड़ों नई अदालतों के बावजूद भी अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि वो भी निरंतर हो रही है | हालात दिनों दिन विस्फोटक होते जा रहे हैं जिनसे निपटने के लिए कुछ ज्यादा कारगर करना और अभी करना बहुत जरूरी हो गया है |

न्यायिक व्यवस्था में सुधारों की बात चलते ही साढ़े तीन करोड़ से अधिक वादों के निस्तारण की बात सबसे पहले आ जाती है | ऐसा भी नहीं है की खुद सरकार व न्याय प्रशासन ने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया | वास्तव में देखें तो पाते हैं की न्याय की सर्वसुलभता व विवादों के निस्तारण के लिए पिछले दिनों न्याय प्रशासन की ओर से विधिक सेवा व संरक्षण ,मध्यस्थता प्रक्रिया ,लोक अदालत व सांध्यकालीन आदालतें तथा न्याय प्रक्रिया में प्ली बार्गेनिंग व्यवस्था जैसे प्रयगोन को सफलतापूर्वक न सिर्फ अपनाया गया बल्कि इसके परिणाम भी काफी सकारात्मक दिख रहे हैं | इसी को देखते हुए इन प्रयोगों को पूरे देश भर में आगे बढ़ाया जा रहा है |

अदालतों में बढ़ते हुए मुकदमों के बोझ को काम करने के तमाम प्रयासों के बावजूद अदालतें और न्यायाधीशों की संख्या ूत के मुंह में जीरे के सामान ही लग रही है | असल में इसकी बी एक वजह है | अदालतों में मुकदमों की औसत आवक दर उसके निस्तारण की औसत दर से कहीं अधिक है | समाज में बढ़ता बेतहाशा अपराध, सरकार द्वारा विभिन्न विषयों पर बनाए जा रहे नए कानून ,समाचार व प्रसार माध्यमों की सुलभता के कारण इन कानूनों के प्रति आम लोगों की सचेतता व जानकारी तथा प्रति वर्ष देश में अधिवक्ताओं की बढ़ती संख्या आदि ही कुल मिलाकर स्थिति को इस दिशा तक ले आए हैं |

इस परिप्रेक्ष्य में सबसे अहम सवाल ये है कि तो क्या आखिर कभी भी ख़त्म हो पाएगा ए मुकदमों का अम्बार ? क्या आम लोगों को कभी त्वरित न्याय मिल पाने की उम्मीद रखनी चाहिए ? क्या कभी भारतीय न्याय व्यवस्था देश के सभी नागरिकों के साथ एक जैसा व्यवहार कर पाने के अपने तथाकथित आदर्श को सच में ही पा सकेगी ? और ऐसे अनेकों ही क्या आज जनमानस के ,न्यायपालिका पर सालों से बने भरोसे को चुनौती देते से प्रतीत हो रहे हैं |

अब समय आ गया है जब प्रयोगों के इस नए दौर में न्यायिक निस्तरः के अन्य बेहतर और तेज़ विकल्पों पर भी विमर्श किया जाए | विधि क्षेत्र में किए जा रहे शोध व् प्रयोगों में निःसंदेह इन विषयों पर भी काम किया जा रहा होगा | पिछले दिनों एक प्रदेश सरकार ने आम लगों को सरकारी चिकित्सा सेवा को  बनाने के लिए मुहल्ला क्लीनिक नामक छोटी किन्तु सुनियोजित चिकित्सालय सह औषधालय उपलब्ध कराने की पहल की थी जो बहुत ही सफल साबित होती दिख रही है |

विधिक व्यवस्था के शोधकर्ता व परामर्शदाता अब इस दिशा में कार्य  कर रहे हैं लोगों को “मुहल्ला लीगल क्लीनिक” उपलब्ध करवाने ,जहां विवाह ,तलाक ,मध्यस्थता ,मुआवजे का निराकरण ,आपसी लेन देन संबधी विवादों के लिए विधिक उपचार देने हेतु विशेष प्रशिक्षण प्राप्त और पूर्ण विधिक अधिकारिता वाले विशेषज्ञों को न्याय निस्तारण में हिस्सेदारी देकर स्थति में क्रांतिकारी परिवर्तन लेन जैसी योजनाओं को कार्यमूर्त रूप दिया जा सके |

वादी या याची को अपने लिए विधिक उपचार पाने में दूसरी बड़ी बाधा आती है ,मसौदा व प्रस्तुतीकरण | इससे उबरने के लिए विधिज्ञ प्रपत्र आधारित याचिका ,जैसा कि वर्तमान में मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजा या किसी वसूली वाले दीवानी मुक़दमे में प्रचलित है | उदाहरण के लिए जैसे बैंकों में वांछित सूचना भरकर आम जान अपना कार्य कर पाते हैं इसी तरह साधारण प्रपत्रों के आधार पर लोग आसानी से अपने लिए उपचार की मांग कर सकेंगे |

इनके अतिरिक्त विधिक शिक्षा व जागरूकता को जनसाधारण के जाने व समझने के लिए इनका हर स्तर पर प्रसार किया जाए |सरकार  के तमाम सम्प्रेषण संस्थान और समाचार माध्यमों के मार्फ़त नागरिकों को कानूनों का पालन करने ,उनका सम्मान करने ,और अवज्ञा हो जाने पर स्वयं को राज्य द्वारा प्रस्तावित जुर्माने को भरने या उपयुक्त सज़ा के लिए खुद को प्रस्तुत करने जैसे नागरिक संस्कारों के पालन हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए | और इन सबसे अधिक जरूरी है समाज की छोटी इकाई ,ग्राम क्षेत्र में ग्राम पंचायत आदि और शहरी क्षेत्र में स्थानीय कल्याण समितियों को भी , आपसी विवादों झगड़ों को सुलझाने हेतु पहल करने का प्रयास करने का अधिकार प्रदान किए जाने से भी  न्यायिक संस्थानों पर बढ़ते मुकदमे को बोझ करने में सहायता मिल सकेगी |

अंततः यह कहा जा सकता है कि देश और समाज को यदि सच में ही विकास और सृजन के मार्ग पर चलना है तो उसे फिर अपने ही प्रयासों से मुकदमों और विवादों के दुष्चक्र से बाहर निकलना होगा और इसके लिए आज और अभी से गंभीर प्रयास करने होंगे |

भीड़तंत्र बनता हुआ लोकतंत्र

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jhajikahin/

 

किसी भी लोकतांत्रिक देश सरकार और असमाज में सहमति व सामांजस्य का हुआ जितना जरूरी है उतना ही आवशयक प्रतिरोध ,आलोचना और प्रश्न उठाने की परमपरा जीवित रहना भी चाहिए | फिर संघर्ष से निकले हुए समाधान की व्यापकता  को कोई चुनौती नहीं देता | इंसानी सम्भयता जब से जंगल जीवन से मुक्त हुई तभी से जनांदोलनों का अस्तित्व रहा है | भारत का आधुनिक इतिहास तथा इस वर्तमान तक पहुचंने की सारी बुनियाद ही आन्दोलनों या कहिये की क्रान्ति पर आधारित रहे | भारत ऐसी स्थ्तितियों में अकेला देश नहीं था | उस समकालीन समय में विश्व के अनेक भागों में इन क्रांतियों और उससे उपजी व्यवस्थाओं ने सत्ता पर खुद को काबिज़ कर लिया था |
भारत में स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद वामपंथी विचारधारा के आंदोलन ने पूँजीपतियों और मजदूरों के दशकों तक चले संघर्ष की उत्त्पत्ति की | ये वो दौर था जब देश को आजाद हुए बहुत समय नहीं बीता था ा, आजादी में सांस ले रहा युवा वर्ग हर मौके , अवसर ,चुनौती में भागीदारी चाहता था | देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का ज़ज़्बा लिए खुद को स्थापित करने कोई कवायद में उसके जिस्म  ओ जान पर देश लिपटा चिपटा रहता था | पूँजीपतियों जमीदारों के अमानवीय शोषणों के विरुद्ध किसानों का गाँव घर त्याग चले जाना भी एक जनांदोलन ही था | भारतीय समाज में जनांदोलन ,हड़ताल ,बंदी ,रैली आदि का समावेश विरासत में मिलने वाली परमपरा थी | किन्तु सारी स्थितियों ,संघर्षों ,आंदोलनों की सार्थकता तभी तक सुनिश्चित होती है जब तक सब कुछ अनुकूल और मर्यादित हो |
शुरू के जनांदोलनों में जो परिश्रम ,धैर्य और सबसे बढ़कर समाधान पर पहुँचने की नीयत इन आन्दोलनों का मंतव्य हुआ करता था | इनके विरोध के प्रतीक धरना ,हड़ताल ,आमरण अनशन ,दीवारों परलिखना ,पत्र पत्रिकाओं में लेखन का विषय आदि हुआ करता था | धीरे धीरे समाज अधिक संघर्षशील व क्रोधी हुआ तो इन आन्दोलनों में हिंसा का समावेश कराया गया , सार्वजनि सम्पत्तियों को नुकसान पहुँचा अपना गुस्सा ज़ाहिर करने लगा | ये स्थिति अधिक बदतर होते हुए अब प्रशासन पुलिस के ऊपर पत्तर ,गोली और बम तक चलाने तक पहुँच गयी ,जो बेहद चिंताजनक बात है |
पिछले दो दशकों में भारतीय जनों का हर छोटी बड़ी बात पर , समस्या पर ,किसी शिकायत के लिए सड़कों पर उतर आने की प्रवृत्ति पर सड़क सुरक्षा से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्था रोड सेफ्टी मिशन सेव द लाइव के शोधकर्ता फ्रेडरिक विलिमस जे  कहते हैं  कि भारत जैसे देश , जहां सड़कें अपने तयशुदा निर्धारित भार से कहीं अधिक दबाव ,देश में बढ़ते वाहनों की संख्या के कारण झेल रही हैं वहीं जनसंघर्ष पर रोज़ाना हज़ारों लाखों की भीड़ अनावस्यक रूप से सडकों  बढ़ाती हैं जिसका असर आसपास के सारे भूक्षेत्र के तनाव पर पड़ता है |

पिछले कुछ दिनों में सरकार  द्वारा पारित नागरिकता क़ानून में संशोधन  के विरुद्ध जिस तरह का प्रदर्शन ,उग्र हिंसा , तोड़फोड़ आगजनी की गयी निर्दोषों की जान गयी और करोड़ों रूपए की सार्वजनिक समपत्ति को नुक्सान पहुंचाया उसने समाज और सरकार को  विवश कर दिया है की ऐसे आन्दोलनों के लिए दिशा निर्देशात्मक कानून लाया जाए और इन उपद्रवियों को ये बोध कराया जा सके की जनांदोलन और जनाक्रोश की आड़ में कोई गैर कानूनी कार्य करने की छूट न मिले |

यहां समाज और विशेषकर उन्हें प्रभावित करने वाले मार्ग निर्देशकों के ज़ेहन में यह जरूर रहनी चाहिए कि इस देश में हिंसक उपद्रव किसी भी जनांदोलन की नीति नहीं रही है कभी चिपको आंदोलन ,नदी के बीच में खड़े होकर ,मौन व्रत ,आमरण अनशन जाने कितने ही प्रकार के जनआंदोलात्मक रास्ते हैं जिनपर चलकर पहले भी आंदोलनकर्ताओं को सफलता मिलती रही है | दूसरी अहम् बात ये की जनांदोलनों को अपने अपने क्षेत्र की विसंगतियों ,अन्याय ,कुरीतियों ,अनुचित के विरूद्ध प्रभावित लोगों की आवाज़ पहुँचाने के उद्देश्य से किया जाता था | न कि संसद द्वारा पारित क़ानून की मुखालफत के लिए |

इन जनांदोलनों के अगुआओं ने मानवीय दुर्गुणोँ से ग्रस्त होकर ताकत और सत्ता पाते ही राजनीति को अपनी नीति का एक हिस्स्सा बना लिया | परिणाम ये हुआ कि राजनीति के प्रभावक्षेत्र में जाकर खुद इन आन्दोलनों में अंदरूनी और बाहरी राजनीति  ही बोलबाला हो गया |सार्वजनिक सम्पत्तियों के नुकसान  व जान माल की क्षति को देखते हुए अब प्रशासन न्यायालय के दिशा निर्देशों  के अनुरूप उपद्रव में तोड़ फोड़ करने वालों की पहचान कर उनसे सारे नुकसान   की भरपाई करने की शुरुआत कर चुकी है और इन कदमों का प्रभाव भी दिख रहा है | आंदोलनकारियों को अब खुद ही अपने लिए नियंत्रित व्यवहार और संयमित  उद्देश्य का रास्ता नियम तय करने चाहिए और पुलिस प्रशासन को भी अब इन हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के नए वैकल्पिक उपायों कोआजमाना चाहिए |

 

सरकार की प्रतिबद्धता और प्रस्तावित कानून

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आरक्षण  की नीति लागू करने के विरूद्ध हुए जनांदोलन के काफी समय बाद एक बार फिर किसी प्रस्तावित कानून के मसौदे को विषय बना कर शुरू हुआ आंदोलन देखते ही देखते देश व्यापी आंदोलन बन गया | यह आंदोलन था इंडिया  अगेंस्ट करप्शन नामक संगठन का  जिसने नागरिक आंदोलन के माध्यम से देश भर में जनलोपाल की नियुक्ति की माँग बहुत  ही पुरज़ोर और कारगर तरीके से उठाई थी | तत्कालीन सैरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक में कुछ संशोधन सुझाव पर विचार करने की मांग के साथ ये आंदोलन बहुत प्रभावकारी हुआ  इतना कि बाद में इसके अगुआ सक्रीय राजनीति  कुछ प्रमुख लोगों में शुमार हुए |
ये परिवर्तन का दौर है ,विशेषकर मोबाइल और इंटरनेट ने संवाद और सम्प्रेषण  की व्यापकता को असीमित विस्तार दे दिया है | अन्ना  आंदोलन वो पहला जनसंघर्ष था जब इसमें सरकार द्वारा प्रस्तावित क़ानून के मसौदे को लोने न न सिर्फ पढ़ा  समझा बल्कि उसकी खामियों को उजागर किया ५ और उन्हें दूर करने के लिए विकल्प भी तलाश कर उन्हें सामने रखा  वर्तमान में न तो ये मुहिम प्रभावशाली रहे न ही इससे जुड़े लोगों ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाया  किंतु संसद के संघर्ष को सड़क पर खींच लाने की प्रवृत्ति से अब अवाम पूरी तरह से वाकिफ हो चुकी थी  वर्तमान केंद्र सरकार अपने पहले कार्यकाल में सदन की ऊपरी सभा में बहुमत न हो पाने के बावजूद बहुत सारे नए कानूनों व प्रस्तावों पर काम करती रही  किंतु वर्ष २०१९ के आम चुनावों में पुत्र भारी बहुमत से सन्ता में आने के बाद ऊपरी सदन राज्यसभा में भी किसी विधेयक को रोकने की विपक्ष की अपेक्षित संख्या कम हो गयी |
जैसा की अंदेशा था की सरकार दोबारा सत्ता में आई तो अजेंडे पर,वर्षों से लंबित सभी विधेयकों को पटल पर रखेगी | पिछले कार्यकाल में तीन तलाक,आर्थिक आधार पर आरक्षण जैसे गैर पारंपिक विषयों पर विधेयक बनाकर अपनी मंशा को पहले ही स्पष्ट कर चुकी इस सरकार ने अपनी इस बार की शुरुआत जम्मू व् कश्मीर राज्य से सम्बंधित विशेष उपबंध धारा ३७० को समाप्त करके की | इसके बाद पड़ोस के देशो के धार्मिक अल्पसंख्यक जिन्हें सालों से शरणर्थी की तरह जीवन गुजारना पड़  रहा था उन्हें विधिक रूप से नागरिकता प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय नागरिकता कानून वर्ष 1955 में सातवां (छ: संशोधन इससे पूर्व की सरकारों ने किया था ) संसोधन कर नागरिकता संसोधन कानून 2019  को दोनों सदनों से पारित करवा कर लागू भी कर दिया |
इस सन्दर्भ में एक और विचारणीय बिंदु रहा न्यायपालिका का रुख व आदेशों ने भी केंद्रीय सरकार के निर्णयों को संविधान के प्रतिकूल नहीं माना | हाल ही में दायर एक जनहित याचिका में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके पूछा है की जनसंख्या विस्फोट की इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार किन उपायों नीतियों पर कार्य कर रही है | केंद्र सरकार जिसने पहले ही लोक कल्याण हेतु प्रस्तावित अधिनियमों जैसे समाज नागरिक संहिता , जनसंख्या नियंत्रण कानून भविष्य में लाए जाने का मन बना लिया है माँननीय न्यायपालिका के निर्देशों के अनुपालन में ज़रा भी विलम्ब नहीं करेगी |

इनके अलावा , धर्मस्थलों व धार्मिक संस्थानों पर नियंत्रण/प्रबंधन विषयक विधेयक , भूसंपत्ति व भवन निर्माण कानून , अखियल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग की स्थापना विषयक कानून राज्यसभा अधिकार क्षेत्र सीमितता कानून , स्वर्ण/आभूषण भंडारण सीमितता कानून ,अखिल भारतीय शिक्षा नीति नियामक कानून आदि वो प्रमुख विधेयक हैं जो सरकार द्वारा प्रस्तावित एजेंडे में सर्वोपरि हैं | इन सबके अलावा अन्य बहुत से क्षेत्रों व विषयों पर नए कानून/संशोधन के अतिरिक्त समय के साथ पुराने पद चुके व वर्तमान में औचित्यहीन हो चुके कानूनों के निरसन /संधोशन व परिमार्जन का विचार भी सरकार के प्रस्तावित कार्यसूची में है |

एक अहम प्रश्न जो बार बार इस सन्दर्भ में सामने आ रहा है वो ये की इन कानूनों की संविधानिकता जांचते हुए भी क्या ये कानून कसौटी पर खरा उतर पाएगा ? कानून और  नज़रिया तो भविष्य में पता चलेगा और न्यायपालिका का नज़रिया तो भविष्य में पता चलेगा और ये भिन्न भिन्न विषयों/मामलों पर भिन्न ही होगा किन्तु वर्तमान में जिस तरह से केंद्र सर्कार एक फसलों/प्रस्तावों/नीतियों आदि पर न्यायपालिका ने अपनी मंशा सपष्ट की है उससे तो ये सरकार के लिए काम से काम नकारात्मक तो नहीं कही जा सकती है | उसपर वर्षों से लंबित रामजन्म भूमि विवाद को भी न्यायपालिका ने अपने निर्णय से वर्तमान केंद्र सरकार के मनोनुकूल ही कर दिया |
सारांशतः यह कहा जा सकता है आने वाले चार वर्षों में सरकार ,संसद सत्रों में लोक कल्याण ,विधि ,शिक्षा ,जनसँख्या आदि से जुड़े अनेक विषयों पर प्रस्तावित/विचारित विधेयकों को प्रस्तुत कर कानून बनाने का भरसक प्रयास करेगी | सरकार को चाहिए की जन सचेतता के लिए इन कानूनों को सरल भाषा में, प्रचार प्रसार द्वारा आम लोगों के समक्ष भी रखे ताकि जनभागीदारी बढ़ाने के साथ साथ लोग मानसिक रूप भी इसके लिए तैयार रहें |

10 quotes of love and life

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ब्लॉग से साइट और साइट से यू ट्यूब तक मैं इन शब्दों ,चित्रों , आवाज़ों ,को आपस में गुंथा बंधा रहना चाहिए | इसी दिशा में किया गया ये प्रयास | आप चाहें तो मुझे सबस्क्राइब कर सकते हैं | मैं हूँ आपका अनाम आदमी

 

 

एक प्याली चाय

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एक प्याली चाय

एक प्याली चाय,
अक्सर मेरे,
भोर के सपनों को तोड़,
मेरी अर्धांगिनी,
के स्नेहिल यथार्थ की,
अनुभूति कराती है॥

 एक प्याली चाय,
अक्सर,बचाती है,
मेरा मान, जब,
असमय और अचानक,
आ जाता है,घर कोई॥

एक प्याली चाय,
अक्सर,बन जाती है,
बहाना,हम कुछ ,
दोस्तों के,मिल बैठ,
गप्पें हांकने का..

एक प्याली चाय,
अक्सर ,देती है,साथ मेरा,
रेलगाडी के,बर्थ पर भी..

एक प्याली चाय,
अक्सर मुझे,खींच ले जाती है,
राधे की,छोटी दूकान पर,
जहाँ मिल जाता है,
एक अखबार भी पढने को॥

एक प्याली चाय,
कितना अलग अलग,
स्वाद देती है,सर्दी में,
गरमी में,और रिमझिम ,
बरसात में भी॥

एक प्याली चाय,
को थामा हुआ,है मैंने,
या की,उसने ही ,
थाम रखी है,
मेरी जिंदगी,
मैं अक्सर सोचता हूँ ……

अक्सर चाय पीते हुए ये पंक्तियां मेरे मन में कौंधती हैं , पहले भी शायद कही थी ……आज फ़िर चाय पी …तो फ़िर कहने का मन किया …………और आपका …??

मफलर से आएगा वाई फाई नेटवर्क

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Chittha charcha fir se shuru - hindi blogging dobara lautane ka prayas

#खड़ीखबर :
केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में दिया फ्री वाई फाई
नेटवर्क सिर्फ मफलर लपेटने पर ही मिलेगा

#खड़ीखबर
अजित पवार,सुप्रिया सुले और राज ठाकरे भी होंगे डिप्टी सीएम
विधायकों को बंधुआ बना कर रखने वाले होटल मालिक ने भी दावा ठोंका

#खड़ीखबर
अब कांग्रेस में अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा
यार ,हर बात में आप राहुल गांधी की और क्यों देखने लगते हैं

#खड़ीखबर :
प्याज पहुंचा सवा सौ रूपए किलो
पकौड़ा स्टार्टप उद्योग पर भारी संकट

#खड़ीखबर :
बलात्कार पर बने  क़ानून को और सख्त बनाया जाएगा
मुझ  नेत्रहीन को भी बता देना : कानून की देवी

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ऐसे लाना चाहिए था राफेल :खड़ीखबर

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खड़ीखबर
pic courtesy ANI News

राफेल की शस्त्र पूजा का तमाशा करने की क्या जरूरत थी :खड़गे
हमारी तरह चुपचाप घोटाले करके ले आना चाहिए था

काँच के शामियाने : स्त्री संघर्ष की एक गाथा

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कांच के शामियाने

किताबें पढना और बात और उन किताबों पर कुछ कहना या लिखना जुदा बात और ज्यादा कठिन इसलिए भी क्योंकि लेखनी से आप पहले से ही परिचित हों तो जी हाँ यह मैं, बात कर रहा हूं रश्मि रविजा के उपन्यास कांच  के शामियाने की। उपन्यास हाथ में आते हुई एक सांस में पढता चला गया और ये काम मैं पहली बार नहीं कर रहा था , खैर |

चूंकि रश्मि मेरे मित्र समूह में हैं सो उनको मैं पढता तो लगभग रोज़ ही रहा हूँ और अपने आसपास घटती  घटनाओं , लोगों , समाचारों पर उनकी सधी हुई प्रतिक्रया अक्सर फेसबुक पर ही बहुत बडी बड़ी बहसों और विमर्शों का बायस बनी हैं | सो उनकी लेखनी से परिचय तो था ही हाँ उपन्यास के रूप में पढना अलग अनुभव रहा |

खुल 203 पन्नों  से सजा हुआ यह उपन्यास बेहद खूबसूरत कलेवर ,उत्कृष्ट पेपर क्वालिटी के साथ  पेपर बैक  में लगभग हर ऑनलाइन स्टोर में उपलब्ध है , | वैसे इसके बारे में पढने के बाद जो बात मेरे विचार में तुरंत आई वो ये थी कि , पढने , दोबारा पढने , सहेजने , अपने किसी मित्र ,दोस्त ,सखा व सहेलियों को उपहारस्वरूप देने योग्य एक उत्कृष्ट रचना साहित्य |
मैं आलोचक नहीं हूँ ,और हो भी नहीं सकता क्योंकि एक विशुद्ध पाठक की ही समझ अभी ठीक से बन नहीं पाई है । हाँ खुद इस अंचल से सम्बन्ध होने के कारण पूरे उपन्यास को पढ़ने के दौरान  मैं खुद कभी जया कभी राजीव ही नहीं बल्कि कभी घर आँगन और आसपास की सभी वस्तुओं में खुद को अनायास ही पाता रहा |
कहानी एक साधारण सी शख्सियत के असाधारण से संघर्ष की कहानी है असाधारण  इसलिए  क्योंकि   उसे  पूरे जीवन  में  भीतर बाहर संघर्ष करना  पड़ता  है  |  उसकी लड़ाई अपने आसपास की परिस्थितियों , अपने आसपास मौजूद परिवारजनों , उनकी दकियानूसी सोच , और विशेषकर अपने जीवन साथी राजीव के विचित्र पुरुषवादी मानसिकता से तब तक चलती रहती है जब तक कि वो इस कांच के शामियाने को तोड़ कर पूरी तरह से बाहर नहीं निकल जाती  है |हालांकि बच्चों में सबसे छोटी जया अपने ससुराल वालों विशेषकर पति के हर जुल्म , हर ताने , हर प्रताड़ना को इतने लम्बे समय तक झेलने के लिए क्यों अभिशप्त हो जाती है , वो भी तब जब वो क़ानून अदालत समझती है , फिर भी उसकी ये विवशता मुझ जैसे पाठक को कई बार बहुत ही क्षुब्ध कर देती है |

लेखिका ने किताब में शैली इतनी जानदार रखी है और रही सही सारी कसर बोलचाल की आसान भाषा ने पूरी कर  दी है | पाठक सरलता से जया के साथ साथ उस  पूरी दुनिया को जी पाता है  | लेखिका  होने के कारण जया  के संघर्षों उसकी स्थिति , शारीरिक व् मानसिक , उसकी व्यथा उसकी कहानी को जितनी प्रभावपूर्ण और मार्मिक रूप से न सिर्फ महसूस बल्कि उसे शब्दों में ढाल कर हमेशा के लिए हम पाठकों के दिमाग में बसा कर रख दिया | या यूं कही कि जाया कांच के शामियाने से निकल कर पाठकों के मन में बैठ गयी और हमेशा रहेगी ठीक उसी तरह जैसे गुनाहों का देवता  की सुधा |
उपन्यास जया की पूरी कहानी है इसलिए जीवन के हर रूप रंग और धुप छाया से रूबरू कराती है मगर आखिर में जाया के जीवन में खुशियों सफलता और आत्मविश्वास का जो इन्द्रधनुष जगा देती है वो पाठक को एक सुखान्त सुकून सा देती है | सच कहूं तो सच होते अनदेखे सपने वाला अंश एक पाठक के रूप में जया जैसे किसी पात्र के दोस्त के रूप में भी मुझे सबसे अधिक पसंद आया , कुल मिला कर संक्षिप्त में कहूं और एक पाठक के रूप में कहूं तो पैसा वसूल है , फ़ौरन ही पढ़ डालने योग्य |