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निराई गुड़ाई की बहुत अहमियत है बागवानी में

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बागवानी मन्त्र

चलिए आज की इस कड़ी में हम बात करेंगे बागवानी से जुड़े उस विषय की जो होता तो सबसे जरूरी है मगर आश्चर्यजनक रूप से सबसे अधिक उपेक्षित विषय है और वो है जड़ों की निराई गुड़ाई , जड़ों की मिट्टी का ऊपर नीचे किया जाना। पिताजी किसान थे , वे अक्सर कहा करते थे जिस तरह सुबह उठ कर फेफड़ों की सफाई के लिए श्वास नलिका और नासिका में अवरुद्ध पित्त्त कफ्फ़ को साफ़ रख कर हम नित्य उन्हें अवरोध मुक्त रखते हैं इसी तरह से पौधों की जड़ों तक हवा ,पानी ,नमी और धूप के संतुलित आहार के लिए पौधों का निराई गुड़ाई बहुत जरूरी बात है।

मैंने अनुभव किया है और देखा पाया है कि अधिकाँश मित्र अक्सर जाने अनजाने पौधे के ऊपरी हिस्से पर बहुत अधिक श्रम और ध्यान देते हैं मगर अपेक्षाकृत- जड़ों की तरफ उदासीनता बनी रह जाती है बेशक कई बार ये जानकारी न होने के कारण भी होता है।

यदि मैं पूछूँ कि , आप अपने पौधों की जड़ों की मिट्टी को कितनी बार हाथ से छू कर देखते हैं , मौसम के अनुसार क्या आपको उनमें बदलाव महसूस होता है , क्या आपने सुनिश्चित किया है कि गमले में जितना पानी आप दे रहे हैं उसकी नमी उस गमले की सबसे नीचे की आखरी जड़ों और रेशों तक पहुँच रही है , जड़ों में अक्सर लग जाने वाली चीटीयों और अनेक तरह के कीटों का सबसे सटीक उपाय और इलाज – निराई गुड़ाई है। यदि मैं कहूँ कि मैं अपने पौधों में हर दूसरे दिन निराई गुड़ाई करता हूँ और क्यारियों में हर चौथे पाँचवे दिन तो शायद बहुत से दोस्तों को नई बात लगेगी क्यूंकि बकौल उनके वे सप्ताह या पंद्रह दिन में एक बार निराई गुड़ाई करते हैं।

निराई गुड़ाई जितनी जरूरी और लाभदायक नन्हें छोटे पौधों के लिए होती है उतनी ही जरुरी बड़े बड़े वृक्षों विशेषकर फल देने वालों के लिए भी होती है। आम लीची केले के बागानों में अक्सर जड़ों की निराई गुड़ाई और जड़ों की मिट्ठी दुरुस्त किए जाने का काम होता है। खीरे , कद्दू, लौकी , आदि तमाम बेलों की जड़ों पर अच्छी तरह से मिट्ठी चढ़ाते रहने का काम जरूरी होता है अन्यथा जड़ें कमज़ोर होकर गलने लगती हैं और कई बार बेलों के अकारण खिंच जाने से टूट भी जाती हैं।

धनिया ,पुदीना , पालक आदि साग पात में निराई गुड़ाई की गुंजाइश सिर्फ क्यारियों में ही उचित होती है गमलों में नहीं और अमरूद आँवला की जड़ें रेशेदार होती हैं इसलिए खुरपी चलाते समय ये डर न हो कि मिट्टी ऊपर नीचे करते समय वो रेशे कट रहे हैं। थोड़े दिनों में वे अपने आप अपनी जगह पकड़ लेते हैं।

खाद डालने से पहले निराई गुड़ाई उतनी ही जरुरी और लाभदायक होती है जितनी कि कोई पीने वाली दवाई की शीशी को उपयोग करने से पहले जोर जोर से हिलाना। खाद चाहे सूखी डालनी हो या गीली घोल वाली , मिटटी की निराई गुड़ाई किए रहने से वो जड़ों तक अधिक तेज़ी और प्रभावी रूप में पहुंचती है।

अब कुछ ध्यान देने वाली बातें , बरसातों में यथासंभव निराई गुड़ाई नहीं की जानी चाहिए जब तक कि जड़ों में अतिरिक्त पानी जमा होकर जड़ों को नुकसान पहुंचाने की संभावना न हो जाए। निराई गुड़ाई इस तरह से बिलकुल न करें कि जड़ों में अपना घर बनाए केंचुए और जोंक सरीखे मिटटी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले जीव जंतु परेशान हों , उन गमलों में निराई गुड़ाई की जरुरत नहीं जीव खुद ब खुद कर लेते हैं

निराई गुड़ाई करें किससे -सबसे मजेदार उत्तर। किसी भी चीज़ से , खुरपी से लेकर चमच्च और कई बार काँटे छुरी तक से वैसे कायदे से तो ग्लव्स पहन कर पतली खुरपी से किया जाना चाहिए यही सुरक्षित भी होता है मगर जरूरी है की आप करें यदि ये न भी उपलब्ध हों तो भी

तो सबसे बड़े काफ़िर घोषित हो गए वसीम रिज़वी

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आज वसीम रिज़वी का नाम देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर की मुगलिया रियाया में नफरत और हिकारत से लिया जा रहा है . कोई ज़हर भरे बोल से उन्हें बद्दुआ दे रहा है . तो कोई गर्दन उड़ा देने की धमकी दे रहा है , और तो और उनके अपने परिवार वाले , बीवी , बच्चे तक सभी वसीम को छोड़कर चले गए .

आखिर उनका गुनाह भी था इतना बड़ा -इतना भयंकर कि जिसकी कल्पना करना भी दुरूह है . फिर क्यों न हो ? जहां एक कार्टून बनाने वाले को , उस कानून को चित्रित , प्रदर्शित करने वाले को इसके लिए ऊके पूरे देश को आतंकित किया जा सकता है , लोगों का गला रेता जा सकता है और मासूम बेगुनाहों पर ट्रक बस चढ़ाया जा सकता है तो फिर तो उस आसमानी किताब में दर्ज किसी भी शब्द , वाक्य , आयात पर सवाल उठाने की. उसमें किसी भी तरह का दोष दिखाने/गिआन की हिमाकत कोई कैसे कर सकता है भला – वो तो शुक्र है कि ये कहने -करने वाला स्वयं उसी सम्प्रदाय से है अन्यथा अभी तक तो जाने क्या क्या न हो गया होता ?? कयामत और जलजला दोनों ही आ चुके होते .

अब जरा इस पहलू पर भी विचार करिए , मज़हबी कट्टरता को ही जीवन का मकसद मां बैठे , और उसके लिए ज़िंदा कौम और पूरी इंसानियत को खलाक कर देने पर उतारू हो जाने वालों में से कोई भी तब कुछ नहीं बोलता करता जब इसी कट्टरता का चोला ओढे , पूरी दुनिया में अन्य मज़हब के मानने वालों को उनके धर्म प्रतीकों के साथ ही खत्म करने की कसमे दिन रात खाई जाती हैं . जब अफगानिस्तान में बुद्ध की मूर्तियां तोड़ी जाती हैं और भारत के अक्षरधाम मंदिर में आतंकी हमला . वो सब कुछ ज़ायज़ है वो सब कुछ मान्य है .

पूरी दुनिया में अब भी , आज भी जेहाद के नाम पर रोज़ कत्ल किए जा रहे मासूम निर्दोष लोगों के हक में और आत्मघातियों के इन जाहिल कबीलों की मानसिकता पर लानत भेजने के लिए दो अल्फ़ाज़ नहीं निकलते देखा गया कभी . बेशक वसीम रिज़वी ने सर्वोच्च अदालत में एक वाद ससंथापित कर के जो माँग रखी है वो प्रथम दृष्टया न्यायालयीय अधिकारिता से परे विषय है और यदि सच में उन शब्दों , पंक्तियों ,आयतों में कुछ भी त्रुटिपूर्ण , दोषपूर्ण या भ्रामक है तो ये उस समाज को स्वयं तय करना होगा , खुद ही विचार विमर्श करके इसका हल निकलना होगा .

मोदी विरोध में आप कहाँ तक आ पहुँचे : सिन्हा साब

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एक समय की बात है , फिल्मी दुनिया में “बिहारी बाबू” के नाम से विख्यात शॉटगन यानि शत्रुघ्न सिन्हा अपन दूसरे साथी कलाकारों की तरह अपनी हीरो छवि की लोकप्रियता के सहारे बिहार के अभिनेता से राजनेता बनने के लिए राजनीति में उतर गए .

ये समय भाजपा के सत्तारूढ़ होने की प्रथम पारी के नायकों यानि अटल , आडवाणी ,जोशी वाली त्रयी और उनकी मंडली वाला समय था . उन दिनों सत्ता और पार्टी में प्रमुखता , पद , मान सब मिला मगर सिन्हा साब की एक दबी छिपी हुई मगर जगजाहिर मुराद पूरी नहीं हो पाई- और वो थी – प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की . मगर बिहार की पीठ पर तो उस वक्त लालू यादव सवार थे . बाद में कमान आई भी हाथ तो तब तक समीकरण बदल चुके थे और सुशासन बाबू नीतीश कुमार नया चेहरा बन चुके थे .

वर्ष 2014 के चुनावों से ठीक पहले बदले परिदृश्य में भाजपा की अगली पंक्ति ने सिर्फ दायित्व संभाल चुकी थी बल्कि इस नई टीम ने केंद्रीय राजनीति से अलग हट कर एक प्रदेश का सफल नेतृत्व कर रहे सदस्य को अपने नेतृत्वकर्ता के रूप में घोषित कर लक्ष्य निर्धारित करके राजनीति में नई शैली और रिकॉर्ड स्थापित कर दिया

वर्षों तक केंद्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण पद , प्रभाव और मंत्रालय अपने पास रखने वाले बिहार के राजनेताओं की तरह से इसकी प्रतिक्रिया -कीर्ति आजाद , शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा जैसे तमाम का अचानक से मुख्य धारा की राजनीति से दरकिनार हो जाना . एक तरह जहां भारतीय जनता पार्टी बहुत लंबे समय तक सत्ता में न रहने के बावजूद भी बिखराव की स्थिति से बहुत दूर रहती है किंतु यहां तो मामला शायद , पद , सीट , टिकट से अधिक भी कुछ और ही होकर रह गया था , बहुतों के लिए .

उन दिनों बहुत से तो सिर्फ इस वजह से मुंह फुलाए फूफा बन गए थे कि वे खुद को कम से कम नरेंद्र मोदी से अधिक बड़े पद और कद का आंक कर बैठे हुए थे . मगर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों ने ये तय कर दिया था कि अब भाजपा का केंद्र और प्रभाव बिहार उत्तरप्रदेश से गुजरात महाराष्ट्र की तरफ मुड़ गया था .

तबसे लेकर सिन्हा जी , लोग करवट की तरह पार्टी बदलते रहे मगर यदि 82 वर्ष की आयु तक भी अभी समाज में अपना योगदान देने के लिए उन्हें तृणमूल कांग्रेस का हाथ और साथ थामना , ही सब कुछ बयाँ कर देता है .

दो बड़े विधिक परिवर्तन : न्यायिक सुधार की कवायद

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case disposal system

अभी हाल ही में दो अलग अलग वादों पर की जा रही सुनवाई के संदर्भ में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर सपष्टीकरण माँगा गया है . यह इन मायनों में बहुत गंभीर और महत्वपूर्ण हैं क्योंकि विधिक व्यवस्था में लाए जा रहे सुधार की दिशा में ये दोनों परिवर्तन दूरगामी प्रभाव व परिणाम देने वाले सिद्ध हो सकते हैं .

इनमें से पहला है केंद्र सरकार को , 138 निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत न्यायालयों में दर्ज और लंबित लाखों मुकदमे , तथा उनकी बढ़ती संख्या के मद्देनज़र इस तरह के वादों के लिए विशेष अदालतों के गठन की दिशा में विचार व कार्ययोजना प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है . असल में इसके पीछे आधार यह दिया गया है कि , चूंकि यह व्यवस्था , चेक लेन -देन , ऋण -अदायगी और भुगतान विषयक सारे वाद व्यवस्था जनित हैं इसलिए इनसे उत्पन्न वादों के निस्तारण के लिए विशेष प्रयास भी सरकार को ही करना अपेक्षित है .

दूसरी व्यवस्था जिसमें नए परिवर्तन संभावनाओं पर विमर्श चल रहा है , वो है पुलिस जाँच /अन्वेषण को और अधिक प्रामाणिक/विधिक बनाने के लिए एक विधिक /न्यायिक अधिकारी -दंडाधिकारी (जाँच ) -पद/काडर के गठन की संभावनाएं .

पुलिस जांच में अक्सर अनियमितताओं , गलतियों के कारण कई बार अभियोजन कमज़ोर होने से वाद पर प्रतिकूल असर पड़ जाता है इन्हीं कमियों , गलतियों को पुलिस जाँच /अन्वेषण के दौरान ही दुरुस्त किए जाने की जरूरत को ध्यान में रखकर इस विकल्प पर विचार चल रहा है .

अदालतों में बरसों से निस्तारण की बाट जोह रहे करोड़ों मुकदमों को समाप्त करने में ये नए ने प्रयोग क्या और कितने सफल हो पाएंगे , ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा .

पत्रकारों पर हमले की समाजवादी परंपरा

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अभी दो दिन पूर्व अपने पिता जी के राजनैतिक शुचितापूर्ण व्यवहार की पुनरावृत्ति करते हुए युवा राजनेता और सपा के लोकप्रिय भैया जी अखिलेश ने भी विरोधी खेमे का करार देकर पत्रकारों पर अपनी खीज़े उतार दी . कुछ वर्षों पहले उनके पिताश्री जी ने एक -उन दिनों पत्रकार , बाद में आप के फेल नेता और आजकल टीवी डिबेट में जलालत झेल रहे एक उजले काले से महोदय के कान के नीचे टिका दिया था . अगले दिन बुला कर पुचकार भी दिया था .

ठीक ऐसा ही कुछ इनके रिश्तेदार और भैया तेजस्वी यादव की प्रेस वार्ता के दौरान भी कई बार किया/कराया जाता रहा है . सवाल ये है कि आखिर पत्रकारों के सवालों तक से असहज होकर उनके साथ मार -पीट तक कर बैठने वाले कैसे , आखिर किस मुँह से खुद को सार्वजनिक प्रतिनिधि कह बोल पाते हैं ??

ताज़ा स्थिति ये है कि दोनों पक्षों , यानि पत्रकार वार्ता के लिए आमंत्रित करने वाले और जिन्हें बुलाया गया था वो भी , दोनों तरफ से एक दूसरे के साथ मारपीट और बदसलूकी किए जाने का संज्ञान लेकर विधिक कार्यवाही करने की शिकायत/प्रातमिकी दर्ज करवा दी है .

यहाँ एक अहम सवाल ये है कि ऐसे राजनेताओं , जिन्हें आम पत्रकारों की उपस्थिति और प्रश्नों से मात्र इसलिए परेशानी हो जाती है क्योंकि बकौल इनके वो पत्रकार या चैनल किसी दल विशेष का समर्थक या विरोधी है , तो ऐसे में फिर पहले ही इन चैनल और पत्रकारों को अपने यहाँ आने से रोक देना चाहिए , जिसकी हिम्मत वे कभी नहीं दिखा पाते हैं .

महाराष्ट्र की सत्तासीन पार्टी जो खुद अपना एक स्थानीय अखबार निकालती है वो तक एक निजी समाचार चैनल द्वारा उनके ऊपर आधारित खबरों , घटनाओं , समस्याओं , अपराधों को उठाने के लिये खुद ही उस चैनल और पत्रकारों के विरुद्ध एक अघोषित युद्ध छेड़ बैठे . “सामना” से पूरी दुनिया पर निशाना साधने वाले लोग खुद ही एक समाचार चैनल का सामना नहीं कर सके .

यहाँ , सोचना तो पत्रकारों को भी चाहिए कि , बार बार मर्यादा लाँघ कर वे अपनी और पत्रकारिता की छवि दोनों को ही भारी नुकसान पहुँचा रहे हैं . खबरों का सरोकार सिर्फ सत्य से होना चाहिए जो अब बाज़ार से तय हो रहा है .

देश छोड़ कर सालों पहले भाग गए अंग्रेज : हाय री किस्मत अब आ गए तैमूर और चंगेज़

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विश्व की कुछ सबसे जरूरी महत्वर्पूण खगोलीय घटनाओं में से एक पिछले दिनों घटी जिसकी प्रतीक्षा कम से कम , खुद को नौटंकी बना चुका मीडिया तो बड़ी बेसब्री से कर ही रहा था . और ये घटना थी नवाब साहब के यहां तैमूर के बाद पैदा होने वाले चश्मो चराग की .

आखिरकार वो दुर्लभतम क्षण भी आ ही गया और मिसेज नवाब बेबो को बेबी हुआ -यानी छोटे नवाब से एक और छोटा नवाब आ गया . पहले वाले छोटे नवाब साब का नाम बड़े ही भारी विचार विमर्श के बाद मुगलिया सल्तनत के परचम को फहराए रखने के लिए दुनिया के कुछ सबसे क्रूरतम और सनकी आक्रमणकारियों में से एक तैमूर लंग से प्रेरणा पाकर तैमूर रखा गया था .

अब जब तैमूरलंग के बाद एक छोटे नवाब और आ गए हैं और दुनिया में “यलगार हो ” का नारा ए तकबीर बुलंद किया ही जा रहा है तो सभी कयास लगा रहे कि यही सही वक्त है कि दुनिया को एक चंगेज़ खान तो अब मिलना ही चईये कि नई ???और आपके हाँ या न से असल में कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला क्योंकि चंगेज़ न आया तो बाबर , औरंगज़ेब कोई न कोई तो आएगा ही .

तेल देखो और तेल की धार देखो

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पेट्रोल 100 रुपए पार चला गया और ये कयामत से भी ज्यादा भयानक बात है . वो भी उस देश में जो कई बार टमाटर प्याज भी 100 रुपये किलो खा पचा चुका है , तो उस देश में 100 रुपए पेट्रोल हो गया और जब ऐसी अनहोनी घट जाए तो फिर उसका प्रभाव भी हाहाकारी ही साबित होना है .

आपने गौर किया ही होगा कि पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमत के कारण सड़कों पर पसरा हुआ सन्नाटा , बिल्कुल सुनाएं पड़े पेट्रोल पम्प , रास्तों पर ताँगे , टमटम , सायकल रिक्शे आदि चलने लगे हैं , बस कार मोटरसायकिल सब गायब ! क्या कह रहे हैं आप ?? ऐसा नहीं हुआ है बल्कि दिन रात सड़कों की छाती रौंदते पेट्रोल पीकर ज़हर उगलते वाहन अब भी और यदि पेट्रोल 500 रुपए प्रति लीटर हो जाए तो भी ये रेलम पेल यूं ही बदस्तूर चलते रहेगा .

ज़रा सा , बस थोड़ा सा पीछे जाकर वो समय और उस समय ज़ाहिर की गई खुशी की भी एक बार कल्पना करिए कि जब देशबंदी के कारण सारा आवागमन रुक गया था . हवा में धुआँ और ज़हर घुलना बंद होते ही कैसे कुदरत ने थोड़े समय के लिए ही सही प्रदूषण के घुटन से फुर्सत पाई थी .

ऐसे समय में जब भारत देश के प्रधानमंत्री मोदी , पूर्ववर्ती सरकारों को ऊर्ज़ा के खपत के लिए 70 वर्षों तक निरंतर अपनी निर्भरता और आयात बढ़ाकर अन्य वैकल्पिक ऊर्ज़ा स्रोतों की भयंकर उपेक्षा से जो स्थिति बना दी है . ये सब उसी का परिणाम है .

देश में लगातार बढ़ते वाहनों की संख्या , अंतरराष्ट्रीय हालातों में तेल उत्पादक व वितरक देशों के बीच बदलता हुआ समीकरण और सबसे ज्यादा कोरोना के कारण पूरी तरह चरमराई वैशिवक अर्थव्यवस्था के कारण यदि पेट्रोलियम तेल के पदार्थों में वृद्धि होती भी है तो इसके लिए सिर्फ केंद्र सरकार को ही कैसे दोषी ठहराया जा सकता है . तो तब तक , तेल देखिए और तेल की धार देखिए . हैं जी

कौआ उड़ , तोता उड़ : संसद में खेलता एक कबूतर बाज

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संसद में हमेशा अपने अलग अलग करतबों से दुनिया को अपनी काबलियत का परिचय देने वाला गाँधी परिवार और कांग्रेस की सल्तनत के आखिरी राजकुमार जनाब राहुल गाँधी जी ने हाल ही में लोकसभा में “कौआ उड़ , तोता उड़ , कौआ उठ , तोता उठ ” नामक लोकप्रिय खेल खेला।

कभी फर्रे लेकर पढ़ते हुए तो कभी आँख मार कर , कभी संसद सत्र के दौरान झपकी लेते हुए तो कभी अपने हाथ के इशारे से साथी सांसदों को उठ बैठ करवाते हुए। संसदीय कार्य प्रणाली , नियम , नीतियाँ , संसदीय भाषा व्यवहार और गरिमा -इन सबसे तो दूर दूर तक भी कोई सरोकार नहीं है कांग्रेस नेता को।

अब जिस सेना के कप्तान की चाल ही अढ़ाई घर के गर्दभ वाली तो फिर उनको सर माथे बिठाए उनकी मूषक फ़ौज तो उन्हें बैग पाईपर मान कर उनकी बीन पर फिर वही करेगी कहेगी जो वो कहते हैं।

और इनका कसूर भी आखिर क्यूँ मानें। अगले को पता है कि अगर एक से सौ तक भी गिनने के लिए किसी ने कह तो उसमें भी पिच्चतीस गलतियां कर बैठेंगे तो फिर बजट जैसे गूढ़ विषय पर अपने पप्पू पने में जो कुछ भी उद्गार व्यक्त करेंगे उसको अगले दस दिनों तक फिर श्री सूजेवाला जी को अपने सूजे हुए विचारों से रफ़ू करते रहना पड़ेगा .

कांग्रेस की भी जिद है कि चाहे कुछ भी हो जाए बच्चा तो हमरा ऐसे ही खेलेगा और जैसे ही मौका मिलेगा ढेला मार कर भाग जाएगा या फिर हारने की नौबत आते ही तीनों विकेट उखाड़ का भाग निकलेगा . अजी हां .

आंदोलन के नाम पर अराजकता और हठधर्मिता : आखिर कब तक

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चलिए ,सड़क ,शहर , लालकिले के बाद अब रेल की पटरियों पर आन्दोलनजीवी खेती किए जाने की मुनादी की गई है। संगठनों ने मिल कर सोचा और फैसला किया है तो जाहिर है पहले की तरह ही कुछ बड़ा सोच कर ही किया होगा।

क्यूंकि गणतंत्र दिवस को ट्रैक्टर रैली निकाल कर किसानों की किस समस्या का कौन सा हल निकला ये बताने समझाने के बदले अगले प्रदर्शन , अशांति , विरोध की नियति तय की जा रही है मानो कोई इवेंट मैनेजमेंट चल रहा हो।

और यदि चल भी रहा हो तो हैरानी कैसी ? जब टूल किट मुहैया कराई जा सकती है तो फिर इवेंट को मैनेज क्यों नहीं ? सरकार खुद संसद में एक एक बात स्पष्ट कर रहीहै , और आपकी भी पता है कि सरकार और प्रधानमंत्री की मंशा सिर्फ और सिर्फ जन कल्याण की है। गांव और किसान के प्रति प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि , सोच और उनकी योजनाएं ही बताती हैं कि ये सरकार कभी भी किसानों के अहितकर कोई कानून कभी नहीं बनाएगी।

सरकार अगले 18 महीने तक इस नए संशोधन को पूरी तरह स्थगित करके अच्छे विधिक विकल्पों के लिए वार्ता बातचीत को तैयार है , बार बार न सिर्फ कहा है , बल्कि एक दर्जन बार बैठ कर बही खाते के साथ सब दुरुस्त करने को बैठी है , मगर जब उद्देश्य हठधर्मिता दिखाना है , मीडिया सोशल मीडिया में चेहरा चमकाना और टीवी स्टूडियो में बैठ कर अपनी टीआरपी बढ़वाना हो तो वो फिर आंदोलन बचता ही कहाँ है ??

और असर तो देखिये , शाहीन बाग़ एन्ड कंपनी जी न्यायालय से मांगने कहने गए थे कि हमारे वाले सड़क बंदी में क्या कमी थी हाकिम हमें भी फिर से वही सब। ..हां वही सब करने की परमीसन तो दी ही जाए , अदालत ने मना कर दिया ,ये किस्सा फिर सही। मगर ये सब आखिर रुकेगा कब ? कब लोग समझना शुरू करेंगे की आज के कठिन समय में सबको अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी उठानी होगी। ये मांगने से अधिक देश के लिए अपना देने का समय है।

हमरा भेलकम काहे नहीं हुआ जी : ई इंस्लट नहीं न चलेगा हो

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लालू जी बब्बा तनिक बीमार क्या हुए , तेजस्वी भैया बस इत्तु से मार्जिन से चीप मुनिस्टर बनते बनते क्या रह गए , मने ई गुंडागर्दी लोग मचा देगा , कोनो मर्यादा कोनो डिसिप्लीन कुछो नहीं। पूरा मीडिया उडिया कैमरा भिडीयो लाईभ सब के साथ आए , खबर भी पाहिले ही भेजवा दिए थे मगर देखिये कोई भेलकम करे , अरे ऊ होता है न बुक्का गुलदस्ता वैसा , लेकर नहीं निकला जी -ई तो इंसल्ट न हुआ हमरा जी।

मने इहे सब लोग है जिनके कारण बाबूजी इतना जोर से बीमार पड़ गए हैं , इहे राजकाज हाथ से निकलता देख कमजोरा गए हैं। बताइये तो ? पहले भी हमारे चेला लोग को भगा दिहिस है कई बार , कहता है की अपाइंटमेन्ट का पर्ची लेकर ही आना होगा।

अरे बताइये ! कोनो मुनिस्टर मिनिस्ट्री अफसर से मिलने जा रहे हैं क्या जी। आगे हमरे बिहाफ पे ई हमारा चेला बोलेगा थोड़ी देर रुक कर सोचेंगे कि आगे और क्या क्या बोल कर हड़काना है।

अरे ऊ वाले जमाने का बात ही और होता था , पार्टी प्रसीडेंट लोग भेल्कम करे खड़ा रहता था हमारे -तब का। बाबूजी का डिसिप्लिन बहुते टाइट था ई मामले में। फैमिली को तो रिसपेक्सट करना , बोलिये तो मैंडेटरी रूल न था जी।

हम सिटिंग विधायक भी न हैं जी , पब्लिक फीगड़ भी न हुए , ऊ हिसाब से भी जनार्दन बाबू को , हमारे भेल्कम के लिए रहना चाहिए था खासकर जब मीडिया को लेकर आए थे हम।