बदज़ुबानी , बदगुमानी , बदहवासी : विपक्षी राजनीति के परम तत्व

जब राजनीति में सिर्फ स्वार्थ , लालच , पैसे की हवस के लिए घुसा और जुड़ा रहा जाता है और सालों दो सालों नहीं बल्कि दशकों तक , पूरे देश , कर समाज के जीवन , अधिकार सब पर डाका डालने की आदत परम्परा सी बन जाती है और फिर ऐसे में अचानक ही एक दिन लोगों को ये सारा खेल समझ आने लगता है।  एक व्यक्ति , एक राजनैतिक विचार , एक राजनैतिक दल ठीक वही सब देखता , दिखाता , बोलता है जो असल में इस देश की जनता कहना सुनना चाहती थी , आगे बढ़ना , पढ़ना , सीखना विकास करना चाहती थी।  उतार फेंका वो दशकों तक बार बार गरीबी हटाओ , देश बचाओ का तिलस्म।  बस सत्ता एक बार हाथ से फिसली और जैसे माला की गाँठ खुलते ही सब बिखर जाता है ठीक वैसे ही सत्ता और कुर्सी का सिरा , शक्ति का नशा दंभ उतारा , सब कुछ सड़क पर आ गया।

अब तक लोगबाग सरकार को , उसकी नीतियों को , कई बार राजनेताओं के कहे और किए को लेकर उन्हें कोसती थी , आलोचना करती थी गालियां भी देती थी मगर इन सबके बावजूद कोई कभी ये नहीं कहता था इस देश का प्रधानमंत्री मर जाए , कोई उसकी बोटी बोटी काटने की बात नहीं करता था , कोई समूह गिरोह बना कर “हाय हाय मोदी , मर जा मोदी जैसी घिनौनी दुआ नहीं माँगता था और तब कोई भी ऐरा गिरा और नत्थू खैरा प्रधानमंत्री जैसी कद्दावर राजनैतिक शक्शियत के पिता माता के बारे में एक शब्द भी बदगुमानी बदजुबानी का कहने की सोच भी नहीं सकता था।  

आज विपक्ष की बदहवासी अपने पतन की चरम सीमा पर है और दिनों दिन न सिर्फ विपक्षी नेताओं की बदगुमानी और बदजुबानी बढ़ रही है बल्कि सार्वजनिक और निजी जीवन में अक्सर अपने बेहूदे बोल , ओछे व्यवहार और निंदनीय आचरण के लिए ही कुख्यात होकर जनता के बीच नुमाया हो रहे हैं , और ज्यादा बढे तो गिरफ्तारी , अदालत ,कचहरी ,जमानत और माफीनामे वाली फाइल तो खुली ही रहती है।  कांग्रेस जैसी कभी बहुत बड़ी रही विपक्षी पार्टी से लेकर अभी हाल ही में धरना अनशन देते हुए , हुड़दंग हल्ला मचाते हुए और अब लोकसभा विधानसभा से लेकर  नगर निगम तक में शराब पीकर जाने से लेकर मार पिटाई फसाद की नीति नियम पर चलने वाली आम आदमी पार्टी के सूरमा , सभी को प्रधानमंत्री मोदी को , उनके पहनावे , बोल चाल , तेवर और न हुआ तो उनके माता पिता सबके बारे में अपमानजनक , घटिया बात बोल कर ही राजनीति की दूकान चलानी है।

अफ़सोस कि , सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस युग में कुछ भी ढका छुपा नहीं रह पाता , कही हुई बात न की गई हरकत और इत्तेफाकन ये जो सीधी सरल सी जनता है , ये भी अब सब , बोले तो सभी कुछ जस का तस समझने लगे हैं , किसको चुनाव के वक्त क्या याद आता है , किसने पहले कब क्या किसे कितना कहा था सब कुछ जनता याद भी रखने लगी है और राजनेताओं को बता जता भी रही है कि उन्हें सब याद रहता है अब।  तो फिलहाल तो खेड़ा जी , अदालत की डाँट का पेड़ा खाकर किसी तरह से अपनी गर्दन बचा पाए हैं आगे आगे देखिए होता है क्या

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