कल के दैनिक जागरण में छपी इस खबर पर नज़र डालना बहुत दिलचस्प है। बिहार के मधेपुरा विधानसभा चुनाव की एक प्रत्याशी के मतदाता पहचान पत्र पर उस मतदाता महिला की नहीं , न ही उसके पति या पिता भाई बंधु और उसके गाँव के भी किसी की नहीं बल्कि सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार की फोटो छपी हुई थी। अब बिहार है तो बहार है , जो कहीं भी संभव नहीं वो यहाँ असंभव नहीं। और हाँ ये तो बस एक बानगी भर है

आज बिहार की शायद ही कोई पंचायत ऐसी बची हो जहाँ पर मतदाता सूची में दर्ज , दर्जनों और सैकड़ों नाम के ग्रामीण पांच दस बीस और पच्चीस साल पहले ही अपने पेशे और नौकरी को लेकर पूरे देश भर में पलायन करके वहीँ बस गए हैं , लेकिन लेकिन ,
लेकिन आज भी अभी भी बहुत से ऐसे तमाम लोगों का नाम दोनों स्थानों की मतदाता सूची में शामिल है और कमला की बात ये है कि बहुत सारे मतदाता आज भी भी दोनों राज्यों , एक जहां वे वर्षों से रह रहे हैं और दूसरा वो जिसे छोड़े हुए वर्षों बीत चुके हैं। इसके साथ ही ये बात इतनी सरलता से समझी जा सकती है कि यदि वास्तव में ही घर घर जाकर वास्तविक मतदाताओं की पहचान की जाए तो जैसा की अधिकांशतः दिखता है आज बिहार के लगभग सारे गाँव घर खाली होते जा रहे हैं।
मतदाताओं की सूची में दर्ज़ नाम , और इस के साथ ही राशन कार्ड या सरकार द्वारा जारी पेंशन , कई योजनाओं और सहायता राशियों के लाभार्थियों और वास्तविक प्राप्तकर्ताआं के बीच का ये अंतर इतना अधिक है कि केंद्र से मिला ढेर सारा पैसा लील जाता है। और ये सब बिहार में दशकों से होता चला आए रहा है।
यहाँ एक सबसे विकट समस्या ये है कि इतने काम समय में चुनाव आयोग द्वारा दशकों से जान बूझ कर की जा रही और इसकी बराबर अनदेखी को किस तरह से दोष रहित कर सकेगा। इससे अलग जिस तरह से बिहार के सभी विपक्षी दलों ने कई सारे तर्कों और प्रश्नों से इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं और उसका तीव्र विरोध कर रहे हैं उसमें ये देखना जरूरी होगा कि अभी आगे ये सुधार और कार्रवाई किस दिशा में आगे बढ़ते हैं ??






