वेंटिलेटर पर रखी चिकित्सा व्यवस्था

दशकों बाद कोई बहुत बड़ी विपत्ति या आपदा कहूँ विकराल रूप लेकर देश दुनिया और समाज को लीलने को खड़ी हो गई है . समस्या ये कि ऐसी सभी त्रासदियों से और इनके होने के बावजूद कभी कोई सबक नहीं सीखा जाता . ये कितनी निराशाजनक और चिंताजनक बात है कि विरासत और विलासिता के प्रतिरूप असंख्य चमत्कारिक भवनों के होने के बावजूद आज आज़ादी के 70 वर्षों तक निरंतर निर्माणों के होते रहने के बाद भी चिकित्सा के लिए स्थान मुहैया कराने वाले अस्पताल और चिकित्सा ससंथान ही कम पड़ गए हैं।

हालांकि चिकित्सक विशेषज्ञों का मत है की इस तरहकी चिकित्स्कीय आपातकाल की कल्पना कभी किसी देश समाज में नहींकी जा सकती थी और कितनी भी तैयारियां की जाएँ इस तरह की बड़ी आपदाओं/बीमारियों के समय वो नाकाफी साबित होते हैं। किन्तु ये उतना भी सच नहीं लगता है। जिस देश में आए दिन प्राकृतिक आपदाओं के साथ मानवीय जनित हादसों /दुर्घटनाओं का प्रवाह बना रहता है और पिछले कुछ समय में तो इनकी तीव्रता बढ़ी ही है तो इसके बावजूद भी इंसानों को बचाने।/बचा सकने लायक जरूरी और बुनियादी जरूरतों पर भी अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

इन सबके बावजूद भी जब भी आम लोगों की जान बचाने का समय आता है तो व्यवस्था ये तक सुनिश्चित नहीं कर पाती , और जिसका परिणाम ये निकलता है कि , कहीं अस्पतालों में पीड़ित मरीज़ ज़िंदा जल कर मर जा रहे हैं तो पूरे देश में प्राण वायु ऑक्सीजन की आपूर्ति न हो पाने के कारण अब तक तक सैकड़ों मरीज़ इसके अभाव में ही दम तोड़ गए।

ठीक तब जब व्यवस्था का संचालन अपने उच्चतम स्तर पर होना चाहिए ठीक उसी समय देश की चिकित्सा व्यवस्था मरणासन्न अवस्था में पहुंची हुई है और कहीं कहीं तो उसका दाह संस्कार भी हो गया है। हालत उन महानगरों की विनाशक हो चुकी है जिनके करता धर्ता करोड़ों रूपए खर्च करके दिन रात बताते रहे पिछले छ सालों से कि उनके मुहल्लों में खुले क्लिनिक की चर्चा अमरीका तक है और दूसरे वो जिन्होंने शुरू में ही कह दिया था कि और भी काम हैं ,ट्विट्टर , न्यूज चैनल वाले झगडे से लेकर गृह मंत्री तक उगाही के काम में मशगूल हैं इसलिए आप अपने अपने परिवार का खुद ही देखो।

अफ़सोस है कि ये व्यवस्था हमने खुद खडी की वो भी पिछले 70 वर्षों में , ठीक है माना कि पश्चिमी देशों में कोरोना ने कहर बरपाया मगर कम से कम यहां की तरह चिताओं पर तो धंधा नहीं किया , ऑक्सीजन , बेड , दवाई , इंजेक्शन तक की कालाबाज़ारी की गई और अब भी ये सब बदस्तूर जारी है। ये हैं हम , हमने असल में ऐसा ही समाज बनाया है अपने लिए।

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