बीमारी नहीं अव्यवस्था और बदहाली डरा रही है

 

अभी बस कुछ दिनों पहले ही ऐसा लगने लगा था मानो , भारत इस कोरोना महामारी के चँगुल से अपेक्षित और अनुमानित नुकसान से कम झेलते हुए बाहर को निकल आया है और ये भी कि वर्ष 2020 के बीत जाने से भी सबको लगा था कि अब तो निश्चय ही हम धीरे धीरे उबर जाएंगे इस संकट से।

और ऐसा सोचने वाले विश्व में सिर्फ अकेले हम नहीं थे , इज़राईल , आस्ट्रेलिया , उत्तर कोरिया आदि बहुत सारे देश अपने यहाँ कोरोना महामारी को बिलकुल ख़त्म करके आगे की ओर बढ़ने की तैयारी में हैं।  मगर अचानक से इस महामारी के नए रूप ने एक बार फिर से देश और दुनिया में दहशत और मौत का ताण्डव शुरू कर दिया है।

हालाँकि पिछ्ले एक वर्ष पहले की स्थिति से तुलना करें तो हम बहुत बेहतर जानकारी और योजना के साथ अब इस बीमारी से निपटने में सक्षम हो चुके हैं।  इलाज के साथ साथ प्रतिरोधी टीकाकरण अभियान भी जोरों शोरों पर है।लेकिन इन सबके बावजूद भारतीय चिकित्सा व्यवस्था में किसी भी आपात स्थिति में उसका पूरी तरह से चरमरा जाना , बेबस , असहाय और लाचार हो जाना बीमारी से ज्यादा दुःखदाई हो जाता है।

इन हालातों  में अक्सर , अस्पतालों , बेड , गहन चिकित्सा केंद्रों , के साथ साथ जब ऑक्सीजन और इंजेक्शन तक की कमी और कालाबाज़ारी जैसी खबरें रोज़ , पल पल आम लोगों को देखने सुनने को मिलती हैं तो इस महामारी के माहौल में वो ज्यादा डराने और निराश करने वाला साबित होता है।

चिकित्सा को धंधा बना कर माफिया की तरह चलाने वाले कुछ व्यापारी चिकित्सक इन हालातों को अपने लिए लॉटरी निकलने जैसा समझ कर सारी नैतिकताओं को ताक पर रख कर बहुत कुछ अमानवीय और गैर कानूनी तक कर डालते हैं।  मृतक को भी गहन चिकित्सा केंद्र में रख कर लाखों रूपए का बिल बना देना , मृतक की देह उनके परिजनों को नहीं सौंपना , दवाई और अन्य ईलाज़ के अधिक पैसे लेना आदि सब कारनामे खूब किए जाते हैं और अब भी वही सब हो रहा है।

अफसोस ये है कि , हर आपदा की तरह इस आपदा की मार भी सबसे अधिक गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार लोगों को ही उठानी पड़ेगी और वो उठा ही रहा है।

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