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मिस्टर केजरीवाल : रिंकू की हत्या वाला वीडियो दिखा या नहीं ??

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असल में इतनी बार टीवी , रेडियो ,ऑटो , मेट्रो सब पर देखते सुनते हैं तो एकबारगी थोड़ा अलग सा लगता भी है लेकिन जैसे  ही देखते कि , अंकित शर्मा जैसे जाबांज़ अधिकारी और देश के सच्चे सपूत को चाकुओं से गोद डालने से लेकर रिंकू शर्मा जैसे तरुण की पीठ में छुरा भोंके जाने जैसी तमाम वो वारदातें जिनमें किसी हिन्दू को क़त्ल कर दिया जाता है पर आँख मूँद कर , मुँह सी कर बैठ जाते हैं तोउसी समय आपका असली चरित्र , सत्ता प्रेम और वोटों केलिए तुष्टिकरण की वही घटिया राजनीतिक से लिथड़ा चेहरा दिखाई दे जाता है।

सीएम साब जी ,उस वक्त आपकी नकली ईमानदारी और शराफत उधड़ कर नीचे गिर जाती जब एक खास वीडियो में सिर्फ हिन्दू ही गुंडे अपराधी दिखाई देने लगते हैं आपको . अपनी दिल्ली के आपराधिक मुकदमों और जेलों में निरुद्ध अपराधियों , आरोपियों , विचाराधीन कैदियों को खुद कभी गिन कर , पहचान करके आइए न एक बार . 

सड़ जी , आपने रिंकू की मॉब लिंचिंग वाला वीडियो , गलती से भी देखा तो नहीं न ?? जय श्री राम बोलने के कारण हत्या की गई है तो यकीनन ही आपके वोट बैंक का नहीं होगा इसलिए , हज़ार लाख करोड़ तो दूर , उसके माता पिता से मिल कर ढांढस देना तो दूर , संवेदना या चिंता का एक शब्द भी नहीं निकला मुँह से , इसी को मक्कारी और दोगलापन कहते हैं .

और फिर जरूरत ही क्या है कुछ कहने की ? बेकार में आपके अपने अमानतुल्ला से लेकर ताहिर हुसैन तक , शर्जील इमाम से लेकर उमर खालिद तक सब आपके अपने मुहल्ले , कुनबे और कैडर वाले लोग नाराज़ न हो जाएंगे . लेकिन याद रहे , ये देश सब कुछ देख भी रहा और समझ भी रहा है .

NCC : तरुण देशभक्तों की फ़ौज

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दिल्ली स्थित जनरल करियप्पा ग्राउंड में वार्षिक राष्ट्रीय कैडेट कोर यानी एनसीसी रैली 2021 का आयोजन आज किया जाना प्रस्तावित है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैली को संबोधित करेंगे। पीएम मोदी का सुनने के लिए एनसीसी कैडेट्स खासे उत्साहित हैं। साथ में उत्साह है गणतंत्र दिवस परेड के बाद आयोजित होने वाली एनसीसी रैली का। साल 1948 में केवल बीस हजार कैडेट्स के साथ शुरू हुई NCC के आज पूरे देश में करीब 14 लाख से ज्यादा कैडेट्स हैं। प्राकृतिक आपदा हो या स्वच्छ भारत अभियान और पल्स पोलियों जैसी पहल या फिर कोई अन्‍य आपदा आम लोगों की सहायता के लिए एनसीसी कैडेट्स ने हर बार अपने हाथ बढ़ाये हैं। इसका जीता जागता रूप कोविड-19 महामारी के दौरान देखने को मिला, जब कोरोना वॉरियर बनकर एनसीसी कैडेट्स ने लोगों तक मदद पहुंचाई।

NCC का इतिहास

राष्ट्रीय कैडेट कोर यानी NCC सबसे पहले जर्मनी में 1666 में शुरू किया गया था। भारत में राष्ट्रीय कैडेट कोर की स्थापना 16 अप्रैल 1948 में की गई थी। लेकिन इसके तार यूनिवर्सिटी कोर से जुड़ी हैं, जिसे इंडियन डिफ़ेस एक्ट 1917 के तहत बनाया गया था। NCC को सैनिकों की सहायता के उद्देश्य से बनाया गया था। इससे पहले साल 1920 में जब इंडियन टेरिटोरियल एक्ट पारित किया गया तो यूनिवर्सिटी कोर की जगह यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर (UTC) ने ले ली। जिसका उद्देश्य था कि UTC का दर्ज़ा बढ़ा दिया जाए और इसे युवाओं के लिए और आकर्षित बनाया जाए। लेकिन युद्ध और आपात काल के लिए इन्हें तैयार करने के लिए एक खास ट्रेनिंग की आवश्यकता के चलते एनसीसी की स्‍थापना की गई। कर्नल गोपाल गुरुनाथ बेवूर को 31 मार्च 1948 को राष्ट्रीय कैडेट कोर का पहला निदेशक बनाया गया। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है।

महिला कैडेट्स

साल 1948 में एनसीसी गर्ल्स डिविज़न बनाया गया ताकि स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों को बराबरी का मौका दिया जा सके। साल 1950 में एयर विंग बना और 1952 में नेवल विंग। स्कूल-कॉलेज स्तर पर लड़कों की तरह लड़कियां भी एनसीसी ज्वाइन करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें भी लड़कों की तरह ट्रेनिंग दी जाती है।

गर्ल्स कैडेट्स की भागीदारी 33% हुई

हाल ही में एनसीसी का विस्तार किया गया है, जिसके तहत एनसीसी में गर्ल्स कैडेट्स की भागीदारी 28 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी हो गई है। इस बात की घोषणा स्‍वयं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। उन्‍होंने कहा कि एनसीसी के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। उन्‍होंने यह भी बताया कि एनसीसी के एक लाख कैडेट विस्तार योजना के तहत फॉरवर्ड और तटीय क्षेत्रों के 1104 स्कूल और कॉलेजों को एनसीसी आवंटित की गई है।

एनसीसी की पहचान

एनसीस में शामिल कैडेट्स के लिए खाकी वर्दी ड्रेस होती है। ‘एकता और अनुशासन’ कोर का आदर्श वाक्य है। NCC के झंडे में तीनों सेनाओं को प्रदर्शित करते तीन रंग होते हैं। लाल आर्मी के लिए, गहरा नीला नेवी के लिए और हल्का नीला वायुसेना के लिए। भारत में राष्ट्रीय कैडेट कोर के माध्यम से विद्यालयों, महाविद्यालयों और पूरे भारत में विश्वविद्यालयों के कैडेटों को छोटे-युद्ध अभ्यास और परेड में बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण, खेल-कूद प्रदान करता है।

युद्ध में जवानों के साथ लिया था हिस्सा

1965 और 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान एनसीसी कैडेट सुरक्षा की दूसरी कतार के रूप में काम किया। उन्होंने सामने से हथियार और गोला बारूद की आपूर्ति, आयुध कारखानों की सहायता के लिए शिविर का आयोजन किया और भी दुश्मन पैराट्रूपर्स पर कब्जा करने के लिए गश्ती दल के रूप में काम किया। इसके अलावा एनसीसी के कैडट्स का सेना में शामिल होना बदस्तूर जारी है। एनसीसी कैडेट्स को सेना में प्रवेश के समय विशेष वरियता भी दी जाती है। NCC युवाओं में चरित्र, मिल-जुलकर काम करने की क्षमता का विकास करती है। इसके अलावा NCC युवाओं में नेतृत्व की क्षमता और सेवा की भावना भी विकसित करता है। यह युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण देकर पहले से तैयार एक रिज़र्व बल बनाता है, जिसका उपयोग राष्ट्रीय आपातकाल के समय सशस्त्र बल के रूप में किया जा सके।

कब ज्वाइन कर सकते हैं एनसीसी

सर्वांगिण विकास और अनुशासन के लिए एनसीसी की शुरूआत स्कूल या कॉलेज लेवल पर होती है। एनसीसी में ट्रैकिंग, माउंटेनिंग, साइकल एक्सपेडिशन जैसे रोमांचक खेल तो होते ही हैं, साथ ही व्यक्तित्व विकास के लिए रचानात्मक कार्य, वाद-विवाद प्रतिगयोगिता, भाषण प्रतियोगिता जैसी गतिविधियां भी कराई जाती है। स्कूल-कॉलेज स्तर पर कैडेट्स के लिए जिले या दूसरे जिले में कैंप लगाए जाते हैं। जहां उन्हें अलग-अलग तरह की ट्रेनिंग और खेल-खूद कराए जाते हैं।

पोस्ट अंश और समाचार :प्रसार भारती समाचार सेवा से साभार लिया गया है

दिल्ली , महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल : 3 अकर्मठ , अकर्मण्य सरकारों से त्रस्त राज्य 

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कहते हैं अनाड़ी का खेल राम , खेल का सत्यानाश।  ठीक यही हाल आज देश के तीन प्रमुख राज्यों , दिल्ली महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का हो गया है।  चाहे कोरोना काल में सामाजिक राजनैतिक और प्रशासनिक दायित्वों के वहां की बात हो या फिर केंद्र राज्य संबंधों में कड़वाहट हो या अन्य कोई भी स्थानीय /राष्ट्रीय मुद्दा।  इन सभी मोर्चों पर ही इन राज्य सरकारों और इनके अगुआ राजनेताओं ने निहायत ही अपरिपक्वता का परिचय देते हुए स्थितियों को और अह्दिक बदतर ही किया है।

देश की राजनीति और स्वयं देश का केंद्र , राजधानी दिल्ली की सरकार , विशेषकर इनके मुखिया कर पार्टी ने पिछले कुछ समय में दिल्ली की पूरी सूरत-सीरत सब बदतर करके रख दिया है।  अपने पिछले कार्यकाल में राजयपाल से हर प्रशासनिक निर्णय पर विवाद और अब केंद्र सरकार के साथ ऐसा ही गतिरोध।  कोरोना की वर्तमान आपदा , प्रदुषण , स्वास्थ्य और यहना तक की प्रदेश की साफ़ सफाई , पेयजल आदि जैसी तमाम बुनियादी समस्याओं में से किसी एक पर भी कोई ठोस कार्य , कोई दूरगामी योजना , कोई समाधान आदि कुछ भी नहीं कर सके।  हाँ विभिन्न समाचार माध्यमों में बार बार प्रकट होकर आत्मप्रचार और दूसरों पर दोषारोपण जरूर करते रहे।  दिल्ली को संभालने में पूरी तरह से नाकाम रही आम आदमी पार्टी अब अन्य राज्यों की तरफ रुख करने का भी मन बना रही है।

देश की आर्थिक राजधानी और मायानगरी मुम्बई के प्रदेश महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार चला रही शिवसेना और इनके अगुआ उद्धव ठाकरे तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से भी ज्यादा कठिन दौर में दिखाई देते रहे।  अपने पुत्र का नाम विवादों में आने , साधु संतों पर हमले ह्त्या , फ़िल्मी सितारों की संदिग्ध मृत्यु , साइन जगत में फैला ड्रग्स का कारोबार , कभी अभिनेत्री कंगना राणावत तो कभी समाचार चैनल और उसके सम्पादक से विवाद और इन सबके बीच उच्चा न्यायपालिका से प्रदेश सकरार को लगातार पड़ती लताड़ ही वो कुछ प्रमुख उपलब्धियां हैं जो पिछले दिनों महाराष्ट्र को देश दुनिया में सुर्ख़ियों में रखती रही।

तीसरा और अंतिम राज्य पश्चिम बंगाल जहां की ममता सरकार यूँ तो अब कुछ समय की मेहमान भर रह गई है , मगर इस सरकार का पूरा कार्यकाल , तृणमूल से असहमत रहने वालों , और सनातन समाज के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा है।  कोरोना जैसी महामारी के समय में भी राज्य सरकार द्वारा पीड़ितों और मृतकों की संख्या न बताना , केंद्र द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान और सहायता योजनाओं को लागू न होने देना ,और बात बात पर खुद सरकार की मुखिया द्वारा अभद्र भाषा और व्यवहार का परिचय।  बस यही कुछ देखने को मिला है पश्चिम बंगाल में।  कानून व्यवस्था प्रशासन ,पुलिस आदि विषयों पर तो इनका रिकॉर्ड और अधिक बदतर है।

पश्चिम बंगाल को तो आने वाले चुनावों में निश्चित रुप से एक अकर्मठ और गैर जिम्मेदार सरकार से मुक्ति मिलती दिख रही है हाँ दिल्ली और महाराष्ट्र के नसीब में अभी कुछ समय और ये सब देखने सुनने को मिलता रहेगा।

छूटते-जुड़ते सोशल नेटवर्किंग साइट्स :भास्सप जी की विदाई का समय

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पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट संसार में लोगबाग व्हाट्सएप के विकल्प के रूप में signal और telegaram को डाउनलोड कर रहे हैं।  असल में ऐसा , व्हाट्सएप और उसका स्वामित्व रखने वाली कंपनी फेसबुक पर उपयोगकर्ताओं की जानकारी अन्य कंपनियों के साथ साझा करने और व्हाट्सएप की प्रस्तावित नई नीति के कारण हो रहा है।

असल में हुआ ये की अभी कुछ दिनपहले ही सबको व्हाट्सएप सन्देश द्वारा उनके नए निर्देशों नियमों के अनुपालन को स्वीकृति देने की सहमति वाला पॉपअप सन्देश दिखा।  यूँ भी व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम के स्वामित्व अधिकार फेसबुक के पास होने के कारण और वैसे भी बहुत से प्रश्न और विवाद खड़े होते रहे जिनमे सबसे अहम् था उपयोगकर्ताओं की जानकारी बिना उनकी सहमति के वाणिज्यिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु साझा करना।

जैसा की स्वाभाविक है रिक्त स्थान को भरने के लिए विकल्प की उपलब्धता अब कहीं अधिक है।  लोगों ने रातों-रात signal नामक एक सोशल चैटिंग एप को न सिर्फ download किया बल्कि उसका उपयोग और पूरे घटनाक्रम की चर्चा पूरे अंतरजाल पर होती रही।

बहुत कम समय में बहुत अधिक उपयोग किए जाने वाले लोकप्रिय एप व्हाट्सएप के बंद होने , आउटडेटेड हो जाने या सबके द्वारा उसे छोड़े जाने या सबके द्वारा उसे छोड़े जाने की बातें भी घूमने लगीं।

वैसे अनुभव ये कहता है कि ,बस थोड़ी देर की होती है ये हलचल।  orkut , google plus , google buzz आदि जैसे दर्जनों सोशल नेट्वर्किंग एप्स ने अपने अपने समय पर उपयोगकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ बनाई थी , मगर धीरे -धीरे लोगबाग उनका नाम भी भूल गए।

ऐसा ही कुछ देर सवेर तकनीक के साथ होता ही है।  नई तकनीक पुरानी की जगह ले लेती है।  पिछले दिनों प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर जब चीन एप्स को प्रतिबंधित करने के बाद देसी एप को विकसित करने के लिए युवाओं को विशेष प्रयास करने का आग्रह किया गया।

ऐसे समय में ,कितना अच्छा हो यदि भारत में स्थानीय मेधा द्वारा भारतीय परिवेश और भारतीयों की जरूरत के अनुकूल इन एप्स को विकसित किया जाए।  वैसे पिछले कुछ समय में ,टूटर , कू ,योरकोट्स और इस जैसे जाने कितने ही एप्स भारतीय युवाओं द्वारा तैयार करके बाज़ार में उतारा गया है जो धीरे धीरे लोकप्रिय भी हो रहे हैं।

विश्व में बढ़ती हिंदी की धमक (विश्व हिंदी दिवस )

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आज विश्व हिंदी दिवस है। प्रेम, संवाद और मैत्री की भाषा हिंदी के वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से यह दिवस मनाया जाता है। हिंदी का फलक विस्तृत हो रहा है। दुनियाभर के विश्वविद्यालयों में हिंदी में अध्ययन-अध्यापन हो रहा है। कोई भी भाषा किसी परिधि में आबद्ध नहीं होती है, बल्कि जहाँ-जहाँ उसका व्यवहार किया जाता है, वहां भाषा विकसित होती जाती हैं। बीते वर्षों में हिंदी न केवल गतिशील हुई है अपितु वैश्विक स्तर पर सम्प्रेषण के सशक्त माध्यम के रूप में उभरी है।

कब हुई विश्व हिंदी दिवस मनाने की शुरुआत

भाषा अनुरागियों द्वारा विश्वभर में हिंदी का उत्सव मनाया जाता है। प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। इस तिथि की महत्ता और हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को विश्व हिंदी दिवस के रुप में मनाए जाने की घोषणा की थी।

दूतावासों में होता है शानदार आयोजन

विश्व के विभिन्न देशों में स्थित भारतीय दूतावासों में प्रमुखता से हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है।
नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास में प्रथम विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया गया था। इसी तरह दुनिया भर में स्थित भारतीय दूतावासों में हिंदी दिवस के अवसर पर विभिन्न प्रतियोगताओं का आयोजन किया जाता है। बच्चों को साहित्य की सरल किताबें भी भेंट की जाती है। उल्लेखनीय है कि भारत में स्थित विदेशी दूतावासों जैसे अमेरिका, चीन, पोलैंड के अधिकारी भी रुचि लेकर हिंदी सीखते हैं।

विश्वविद्यालयों से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में हिंदी का बोलबाला

हिंदी विश्व की पांच सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में सम्मिलित है। विश्वभर के 130 से भी अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा में अध्ययन-अध्यापन होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने विस्तार हेतु हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग कर रही है। हिंदी में विज्ञापन दिए जा रहे हैं। हिंदी कम्युनिटी एक्सपर्ट की नियुक्तियां बड़ी संख्या में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में हो रही है। इन सब में गूगल, अमेजॉन जैसी कंपनियां शामिल हैं।

जानिए क्या है विश्व हिंदी दिवस और हिंदी दिवस में अंतर

विश्व हिंदी दिवस और हिंदी दिवस दो अलग-अलग दिन हैं। विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है, जबकि हिंदी दिवस 14 सितंबर को मनाया जाता है। विश्व हिंदी दिवस, हिंदी के प्रचार-,प्रसार के उद्देश्य से मनाया जाता है। वहीं, 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था, इसीलिए इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं।

पशुओं की स्मगलिंग और हवाला के जरिये 1000 करोड़ का मालिक बन बैठा इनामुल हक़ : 24 दिसंबर तक CBI हिरासत में 

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सीमा सुरक्षा बल के एक अधिकारी के साथ मिलीभगत करके सीमा पार को गौधन एवं अन्य पशुओं की स्मगलिंग करने वाला और पशु स्मगलरों का सरताज कहलाने वाला पश्चिम बर्धमान का निवासी इनामुल हक़ अब सीबीआई की गिरफ्त में है।  कोलकाता उच्च न्यायालय ने उसे ,पूछताछ के लिए सीबीआई की रिमांड पर भेज दिया गया है।

इमानुल हक़ उस वक्त पहली बार सीबीआई के रडार पर  सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी कमांडेंट जिबु मैथ्यू को सीबीआई ने अलपुझा रेलवे स्टेशन पर 47 लाख रुपए नकद के साथ पकड़ा था।यह रकम उसकी आय से कहीं अधिक होने के कारण , पूछताछ में उसने ये सारा सच स्वीकार कर लिया कि यह अवैध धन उसने अपने स्मगलर साथी हक़ के माध्यम से कमाया था।  

वर्ष 2018 में शुरू हुई सीबीआई की इस प्रारंभिक जाँच में सीमा सुरक्षा बल की 36वीं बटालियन के कमांडेंट सतीश कुमार का नाम आने के बाद ये सारा प्रकरण जाँच एजेंसियों के रडार पर आ गया था।

सूत्रों के अनुसार सीमापार बांग्लादेश को किये जा रहे गौधन की इस पशु स्मगलिंग का मुख्य कर्ता धर्ता इनामुल हक़ , इस अवैध धंधे से और अपने दुबई के सहयोगियों से हवाला के जरिये लगभग 1000 करोड़ की संपत्ति का मालिक बना हुआ था।  लालगोला , मुर्शिदाबाद ,कोलकाता और दुबई में भी इसकी कई बेनामी सम्पत्तियों का खुलासा हुआ है।  

सीबीआई को मिली यह सफलता सीमा पार बांग्लादेश को किये जा रहे गौ धन की समग्लिंग के अवैध धंधे /अपराध को रोकने में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

विरोध के बाद कर्नाटक सरकार ने ब्राह्मणों की छवि को ठेस पहुँचाने वाले अंशों को  शैक्षिणक पाठ्यपुस्तकों से हटाया

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दो दिन पहले ब्राह्मणों के कुछ समूहों द्वारा कर्नाटक के विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों में वर्णित कुछ उन अंशों को हटाया गया जिनसे ब्राह्मणों की भावनाओं को आहत करने वाला माना गया था। राज्य सरकार ने इन पुस्तकों से उन अनुच्छेदों ,वाक्यों और पाठों को हटाने का निर्णय लिया।

प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा मंत्री श्री एस सुरेश ने राज्य के पुलिस आयुक्त को इस बाबत लिखित शिकायत की थी की कक्षा 6 के सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तक में वर्णित उन अंशों को किताबों से हटाया जाए  जिनसे ब्राह्मणों की धार्मिक भावना को चोट पहुंचती है।

सामाजिक विज्ञान की इस पुस्तक में पृष्ठ संख्या 82 व 83 पर वर्णित अध्याय “नए धर्मों का उदय ” अल्पायु के शिशुओं के लिए अनुचित व असंगत है।  इसलिए इसे अविलम्ब हटा देना चाहिए।  गत मंगलवार को कर्नाटक राज्य ब्राह्मण विकास बोर्ड ने इस मामले को प्रमुखता से उठाते हुए इसका पुरज़ोर विरोध किया था।

विशेषकर इसमें वर्णित यह बात कि , वैदिक काल में कृषि जनित एवं दुधारू पशुओं की बलि देने की प्रथा के कारण खाद्यान्न संकट और अकाल पड़ा था पर बहुत ही सख्त विरोध जताया गया।

शिक्षा मंत्री सुरेश ने इसके साथ ही कक्षा एक से लेकर कक्षा दस तक पढ़ाई जाने वाली सभी पाठ्यपुस्तकों के पाठ व सामग्री की जांच और परीक्षण हेतु एक उच्च स्तरीय समिति का भी गठन कर दिया है।

 

सिंधु से नहीं बना है शब्द हिन्दू : प्राचीनतम ग्रंथों में है उल्लेख

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“हिन्दू” शब्द की खोज –
“हीनं दुष्यति इति हिन्दूः से हुई है।”

अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

‘हिन्दू’ शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन, संस्कृत शब्द से है!

यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विछेदन करें तो पायेंगे
हीन+दू = हीन भावना + से दूर

अर्थात जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे, मुक्त रहे, वो हिन्दू है !

हमें बार-बार, सदा झूठ ही बतलाया जाता है कि हिन्दू शब्द मुगलों ने हमें दिया, जो “सिंधु” से “हिन्दू” हुआ l

हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !

जानिए, कहाँ से आया हिन्दू शब्द, और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?

कुछ लोग यह कहते हैं कि हिन्दू शब्द सिंधु से बना है औऱ यह फारसी शब्द है। परंतु ऐसा कुछ नहीं है!
ये केवल झुठ फ़ैलाया जाता है।

हमारे “वेदों” और “पुराणों” में हिन्दू शब्द का उल्लेख मिलता है। आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है!

“ऋग्वेद” के “ब्रहस्पति अग्यम” में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-
“हिमलयं समारभ्य
यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं
हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।

अर्थात : हिमालय से इंदु सरोवर तक, देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं!

केवल “वेद” ही नहीं, बल्कि “शैव” ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं:-

“हीनं च दूष्यतेव् *हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।”

अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं!
इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक “कल्पद्रुम” में भी दोहराया गया है :

“हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”

अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

“पारिजात हरण” में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-

”हिनस्ति तपसा पापां
दैहिकां दुष्टं ।
हेतिभिः श्त्रुवर्गं च
स हिन्दुर्भिधियते।”

अर्थात :- जो अपने तप से शत्रुओं का, दुष्टों का, और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है !

“माधव दिग्विजय” में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-

“ओंकारमन्त्रमूलाढ्य
पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।
गौभक्तो भारत:
गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।

अर्थात : वो जो “ओमकार” को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, गौपालक रहे, तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है!

केवल इतना ही नहीं, हमारे “ऋगवेद” (८:२:४१) में विवहिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है, जिन्होंने 46,000 गौमाता दान में दी थी! और “ऋग्वेद मंडल” में भी उनका वर्णन मिलता है l

बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहनेवाले, सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू हैं।
“हिनस्तु दुरिताम????????????????

व्हाट्स अप पर प्राप्त सन्देश

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति हिमा कोहली को बनाया गया तेलंगाना उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश

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सर्वोच्च न्यायलय कोलिजियम ने आज दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुश्री हिमा कोहली को तेलंगाना उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का अनुमोदन कर दिया।

सुश्री हिमा कोहली जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत दिल्ली अधिवक्ता परिषद में एक अधिवक्ता के रूप में प्रारम्भ किया था।  उन्हें वर्ष 2006 में दिल्ली उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था और अगस्त 2007 में उन्हें स्थाई कर दिया गया था।  

सुश्री हिमा कोहली को मार्च 2020 में दिल्ली न्यायिक अकादमी की समिति का अध्यक्ष का पदभार भी दिया गया था।

ज्ञात हो कि , आज कॉलेजियम ने पाँच न्यायमूर्तियों को विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने का अनुमोदन भी किया है जो इस प्रकार हैं

न्यायमूर्ति मुरलीधर : उड़ीसा उच्च न्यायालय 
न्यायमूर्ति संजीब बनर्जी :मद्रास उच्च न्यायालय 
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल : जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय 
न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया : गौहाटी उच्च न्यायालय 

1971 के युद्ध से जुड़े वो तथ्य जो कभी बाहर नहीं आ पाए 

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आज ही के दिन पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने अपनी वर्दी , मैडल और बची खुची इज्जत को समपर्पित करके कायरता और कलंक का वो अध्याय लिखा था जो हर लम्हा पाकिस्तान को किसी नासूर की तरह चुभता रहेगा। जब जब भारत अपना ये विजय दिवस मनाएगा पाकिस्तान को अपना काला मुँह और बदनीयत शक्ल छुपानी होगी।

हिंदुस्तान में 16 दिसम्बर को विजय पर्व या विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन हमारी फौज ने पाकिस्तान की सेना के दाँत खट्टे किए थे। पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया था। आत्मसमर्पण करने वाले किसी पाकिस्तानी सैनिक को नुकसान नहीं पहुंचाया, सकुशल वापस जाने दिया। पूर्वी पाकिस्तान आजाद हुआ, जो बांग्लादेश के नाम से स्वतंत्र देश बना। बांग्लादेश तब से लेकर आजतक खुले मंच पर भारत का गुणगान करता है।

लेकिन क्या आप हम जानते हैं कि जनरल नियाजी द्वारा किये गए इस आत्मसमर्पण के बाद क्या हुआ था : देखिये 

सरेंडर करने के बाद जनरल एएके नियाजी का पाकिस्तान में रहना दूभर हो गया। हर तरह की यातनाएँ उनको और उनके परिवार को दी जाने लगी। उस वक्त पाकिस्तान में जो भी व्यक्ति अपने नाम के आगे नियाजी लगाता था, उसे गद्दार की कौम कहा जाता था। नियाजी बिरादरी के लोग इस कदर भयभीत हुए, उन्होंने नियाजी लगाना ही बंद कर दिया। इस शब्द को पाकिस्तान ने गाली की संज्ञा दे दी। हालांकि मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान भी इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। 1971 का संघर्ष विराम एक ऐसा अध्याय था जिसके बाद भारतीय सैन्य ताकत नए तेवर के साथ उभरी। दुनिया ने देखा कि जब ये सेना किसी देश को घुटने पर टिका सकती है तो कुछ भी कर सकती है।

ये तो हुई पाकिस्तान की बात , अब भारत की बात करें तो सेना और उसके जांबाज़ सेनापति मानेकशॉ के बहुत सारे विरोधों और असहमतियों के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के फैसलों ने बाद में भारत का कितना और कैसा नुकसान पहुँचाया इस पर कभी बात ही नहीं की गई।

साल 1971 भी ऐसा ही एक पड़ाव था जब हमें महान विजय प्राप्त हुई, जिसमें हमने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को दफन किया था। वह एक सैन्य विजय के साथ महान वैचारिक विजय भी थी। बस एक और कदम की दरकार थी कि कश्मीर विवाद समाप्त हुआ होता। हम पाकिस्तान के विचार को ध्वस्त कर देते। 1971 में गंवाए इस अवसर ने राजनेता इंदिरा गांधी के नजरिये की सीमाएं स्पष्ट कर दीं। शायद नेताओं की जमात सत्ता हित से आगे सोच भी नहीं पाती।

पाकिस्तान का बंगाल आक्रमण 25 मार्च 1971 को प्रारंभ हुआ। जनरल मानेकशॉ की जीवनी में जनरल दीपेंदर सिंह लिखते हैं कि उसी रात सेना मुख्यालय में हुई आपात बैठक में इंदिरा गांधी ने जनरल मानेकशॉ से पूछा कि हम कुछ कर सकते हैं क्या? इसके जवाब में ‘मुक्ति वाहिनी’ का जन्म हुआ। फिर 28 अप्रैल की कैबिनेट बैठक में पूर्वी पाकिस्तान पर तत्काल आक्रमण के निर्देश को लेकर मानेकशॉ का यह जवाब कि सेनाएं अभी इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं, उन्हें भू-राजनीति की स्पष्ट समझ वाला कमांडर सिद्ध करता है। उन्होंने कहा कि सेनाएं चुनाव करा रही थीं। अब खाली हुई हैं।

देश के नेता तो यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि युद्ध की इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर कश्मीर और फिर आगे पाकिस्तान समस्या का स्थायी समाधान भी हो सकता है। हमारी असल समस्या कश्मीर थी, लेकिन कश्मीर का कोई जिक्र नहीं करता। वे कैसे समझते कि पश्चिम में पाकिस्तान की पराजय बांग्लादेश की आजादी का मार्ग स्वत: बना सकती है। युद्ध से पूर्व पश्चिमी मोर्चे पर आक्रामक रणनीति के निर्देश जारी किए गए थे। सारी तैयारियां पूर्ण थीं। जनरल संधू अपनी पुस्तक ‘बैटलग्राउंड छंब’ में लिखते हैं कि युद्ध से महज दो दिन पहले अचानक 1 दिसंबर को प्रधानमंत्री द्वारा रक्षात्मक रणनीति के निर्देश दिए गए। इसने पश्चिमी मोर्चे पर हमारे समस्त सैन्य आक्रमण प्लान पर अचानक ब्रेक लगा दिया। अब हम न हाजीपीर पर हमला कर पाते और न लाहौर स्यालकोट सेक्टरों पर। सेना के हाथ बांध दिए गए।

मानेकशॉ के जबरदस्त प्रतिरोध के बावजूद इंदिरा गांधी नहीं मानीं और कहा कि यदि हम पश्चिमी सीमा पर आक्रामक हुए तो अंतरराष्ट्रीय विरोध नहीं झेल पाएंगे। निक्सन-र्किंसग्जर का दबाव था, लेकिन रणनीति बदलने की आखिर मजबूरी क्या थी? इसका कश्मीर विवाद के भविष्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। हम युद्धविराम रेखा तक ही सीमित रह गए। छंब का हमारा 120 वर्ग किमी का इलाका भी पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। एक दुर्भाग्यपूर्ण आदेश ने 1971 के युद्ध की उस विजय को हमारे लिए अर्थहीन कर दिया। जबकि उस युद्ध में कश्मीर वापसी की संभावनाएं स्पष्ट दिख रही थीं, पर सियासी नेतृत्व में साहस नहीं था। वह बंगाल की खाड़ी की तरफ बढ़ रहे अमेरिकी बेड़े से डर गया था। आखिर जिनकी प्रकृति ही भीरुता की हो, वे धमकियों से भी डर जाते हैं।

बांग्लादेश बनाने की वाहवाही को भारत के राष्ट्रीय हित से अधिक महत्व दिया गया। शिमला समझौता हुआ। भुट्टो को उनके सैनिक मिल गए, पर हमने छंब गंवा दिया। बांग्लादेश बनने के बाद वहां की प्रताड़ित 85 लाख हिंदू आबादी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हमें लेनी चाहिए थी, लेकिन राष्ट्रीय हित की समझ के अभाव से ऐसा न हो सका।

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