पत्रकारों पर हमले की समाजवादी परंपरा

अभी दो दिन पूर्व अपने पिता जी के राजनैतिक शुचितापूर्ण व्यवहार की पुनरावृत्ति करते हुए युवा राजनेता और सपा के लोकप्रिय भैया जी अखिलेश ने भी विरोधी खेमे का करार देकर पत्रकारों पर अपनी खीज़े उतार दी . कुछ वर्षों पहले उनके पिताश्री जी ने एक -उन दिनों पत्रकार , बाद में आप के फेल नेता और आजकल टीवी डिबेट में जलालत झेल रहे एक उजले काले से महोदय के कान के नीचे टिका दिया था . अगले दिन बुला कर पुचकार भी दिया था .

ठीक ऐसा ही कुछ इनके रिश्तेदार और भैया तेजस्वी यादव की प्रेस वार्ता के दौरान भी कई बार किया/कराया जाता रहा है . सवाल ये है कि आखिर पत्रकारों के सवालों तक से असहज होकर उनके साथ मार -पीट तक कर बैठने वाले कैसे , आखिर किस मुँह से खुद को सार्वजनिक प्रतिनिधि कह बोल पाते हैं ??

ताज़ा स्थिति ये है कि दोनों पक्षों , यानि पत्रकार वार्ता के लिए आमंत्रित करने वाले और जिन्हें बुलाया गया था वो भी , दोनों तरफ से एक दूसरे के साथ मारपीट और बदसलूकी किए जाने का संज्ञान लेकर विधिक कार्यवाही करने की शिकायत/प्रातमिकी दर्ज करवा दी है .

यहाँ एक अहम सवाल ये है कि ऐसे राजनेताओं , जिन्हें आम पत्रकारों की उपस्थिति और प्रश्नों से मात्र इसलिए परेशानी हो जाती है क्योंकि बकौल इनके वो पत्रकार या चैनल किसी दल विशेष का समर्थक या विरोधी है , तो ऐसे में फिर पहले ही इन चैनल और पत्रकारों को अपने यहाँ आने से रोक देना चाहिए , जिसकी हिम्मत वे कभी नहीं दिखा पाते हैं .

महाराष्ट्र की सत्तासीन पार्टी जो खुद अपना एक स्थानीय अखबार निकालती है वो तक एक निजी समाचार चैनल द्वारा उनके ऊपर आधारित खबरों , घटनाओं , समस्याओं , अपराधों को उठाने के लिये खुद ही उस चैनल और पत्रकारों के विरुद्ध एक अघोषित युद्ध छेड़ बैठे . “सामना” से पूरी दुनिया पर निशाना साधने वाले लोग खुद ही एक समाचार चैनल का सामना नहीं कर सके .

यहाँ , सोचना तो पत्रकारों को भी चाहिए कि , बार बार मर्यादा लाँघ कर वे अपनी और पत्रकारिता की छवि दोनों को ही भारी नुकसान पहुँचा रहे हैं . खबरों का सरोकार सिर्फ सत्य से होना चाहिए जो अब बाज़ार से तय हो रहा है .

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