आयातित सामाजिक परम्पराएं : एक विमर्श

पिछले एक दशक में भारतीय समाज में कुछ बहुत ही क्रांतिकारी परिवर्तन देखने सुनने को मिल रहे हैं । ये परिवर्तन भारतीय समाज को क्या और कितना बदलेंगे ये तो आने वाला समय भी बताएगा और भविष्य में भारतीय समाज को एक मोड पर आकर ये निर्णय भी लेना ही होगा कि आने वाला समाज कैसा होगा ? क्या धीरे धीरे भारतीय समाज में पैठ बनाती ये नवीन परंपराएं और चलन भारतीय समाज की बरसों पुरानी चूलें हिला देगा ?: या फ़िर कि आने वाले समय में लाख विरोध और प्रतिक्रियाओं के बावजूद यही परंपराएं  युगों से चली आ रही भारतीय रीतियों के ऊपर भारी पडती हुई संचालक परंपराएं बन जाएंगीं ।
आज भारतीय समाज में , विशेषकर शहरी समाज में , लिव इन रिलेशनशिप , सरोगेट मदर ,  मर्सी किलिंग , होमो सैक्सुऐलिटी और इन जैसी और भी कई आ रही और आने वाली बहुत सी परंपराओं ने अब खुद को स्थापित करने के लिए न सिर्फ़ सरकार और समाज के सामने चुनौती खडी की है बल्कि आज वे अदालतों का दरवाज़ा खटखटा कर उन्हें कानूनी /वैधानिक मान्यता दिलाने की लडाई शुरू भी कर चुके हैं ।
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ऐसा हो सकता है कि कई लोगों को पहले इसी बात से ही एतराज़ हो कि जिन परंपराओं की बात ऊपर की गई है । उनमें से अधिकांश या सारी ही भारतीय समाज में कभी न कभी किसी न किसी रूप में प्रचलित रही हैं इसलिए इन्हें पश्चिमी देशों से आयातित हुआ नहीं माना जा सकता । इस राय से इत्तेफ़ाक रखा जा सकता है । हालांकि जितने भी उदाहरण हैं वे सब उन ग्रंथों और इतिहासकारों द्वारा लिखे गई उस इतिहास पर आधारित हैं जिनके पूरी औचित्य और प्रमाणिकता पर ही अभी बहस चल रही है । आईये इन्हीं में से कुछ परंपराओं का उदाहरण लेते हैं ।
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हाल ही में चर्चित अरूणा शानबाग की दया मुत्यु याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने सरकार को ये निर्देश जारी किए हैं कि वो इस विषय पर व्यापक बहस और विमर्श करने के बाद इस दिशा में कोई स्पष्ट कानून बनाए ताकि उसके परिप्रेक्ष्य में ऐसे मुकदमों की व्याख्या की जा सके । भारत में मर्सी किलिंग की बात जैसे ही पुन: बहस के लिए सामने आई है एक बार फ़िर से उस दलील को रखा गया है कि ये परंपरा प्राचीनकाल में भी प्रचलित थी और साधू संत अपने जीवन को समाप्त करने के लिए इसका सहारा लेते थे ।जबकि स्थिति सर्वथा भिन्न है ।
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                        प्राचीन काल की जिस प्रथा की ओर ईशारा किया जा रहा है उसे “सल्लेखन ” कहा जाता था । इसे अपनाने वाले न सिर्फ़ साधू संत थे बल्कि एक प्रसिद्ध गुप्त शासक ने भी अपने जीवन के अंतिम दिनों में इसका सहारा लिया था । इस प्रक्रिया के तहत लगातार उपवास रख कर शरीर को इतना कमज़ोर कर लिया जाता था कि अंतत: मुत्यु हो जाती थी । जहां तक भारतीय इतिहास में इच्छा म्रुत्यु की बात है तो महाभारत काल में युवराज देवव्रत जिन्हें भीष्म पितामह कहा जाता है , संदर्भ है कि पितृ स्नेह के लिए लिए गए आजीवन अविवाहित रहने का व्रत लेने के कारण उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था , जो की इसके ठीक उलट था वो न मनचाहे समय तक जिंदगी जीते रहने का वरदान था मौत पाने का अधिकार नहीं । इस लिहाज़ से जीवन न जी सकने जैसी परिस्थितियों के रूबरू कानूनी रूप से मौत पाने या देने के अधिकार की लडाई मर्सी किलिंग कहलानी चाहिए ।
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लिव इन रिलेशनशिप , इस मुद्दे पर दक्षिण की मशहूर अभिनेत्री खुशबू द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि दो बालिग लोग अपनी सहमति और इच्छा से एक साथ युगल दंपत्ति की तरह रहते हैं तो वो किसी भी दृष्टिकोण से गैर कानूनी या गलत नहीं है । इस फ़ैसले को न सिर्फ़ विवाह जैसी संस्थाओं के लिए चुनौती के रूप में लिया गया बल्कि ये भी दलील दी गई कि अदालत ने इस फ़ैसले पर मुहर लगा कर ये जता दिया है कि न तो ये अवैधानिक है न ही अनैतिक ।
जिन लोगों ने विरोध में प्रतिक्रिया दी उन्हें कहा गया कि प्राचीन इतिहास में भी इस तरह के बहुत से उदाहरण देखने सुनने को मौजूद हैं । राधा कृष्ण के संबंध को भी उदाहरण के तौर पर उधृत किया गया कई बार , लेकिन न तो उन संबंधों की प्रमाणिकता को सिद्द किया जा सका है और न ही उसका स्वरूप उस संदर्भ में सटीक लगता है जिस संदर्भ में लिव इन रिलेशनशिप को देखा जा रहा है समाज द्वारा । सबसे बडी बात ये कि इन संबंधों को कभी भी दैहिक रिश्तों और उससे उपजे प्रश्नों के लिए नहीं चिन्हित किया गया ।
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आज जिस लिव इन रिलेशनशग्प को कानूनी जामा पहनाया गया है उसे बहुत ही व्यापक रूप से व्याख्यायित करने के बावजूद अभी उन रिश्तों से उत्पन्न संतानों , उन रिश्तों से उपजे और मिले या न मिले अधिकारों या दायित्वों का निर्धारण होना भी अभी बांकी ही है । ऐसे में पूरे समाज से उंगलियों पर गिने इक्के दुक्के अपुष्ट उदाहरणों को सामने रख कर ये साबित करने की कोशिश कि ये सब पहले भी प्रचलित और मान्य था , आसानी से गले नहीं उतरती ।
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इनके अलावा मदर सरोगेसी , और होमो सैक्सुएलिटी जैसी परंपराओं को आत्मसात किए जाने और उसके वैधानीकरण के पीछे भी अक्सर ऐसे ही तर्कों का सहारा लिया जाता रहा है ।बल्कि इन्हीं उदाहरणों के आधार पर ये साबित करने की कोशिश भी होती रही है कि ये सब प्रचलित तो पहले से ही था बस उसे वैधानिकता का सवाल अब सामाजिक रूप से मुखर हुआ है जिसे समाज और सरकार को भी बेहिचक स्वीकार कर लेना चाहिए ।
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ऐसा ही कोई उदाहरण कल को वाईफ़ स्वैपिंग , फ़ोन सैक्स आदि जैसी निहायत ही अकल्पनीय और मानवता को शर्मसार करने वाली परंपराओं के पक्ष में दिखाई जा सकती हैं ।लेकिन सवाल ये है कि यदि ये पश्चिमी देशों से जरा भी प्रभावित (कई बार संचालित भी )नहीं है तो फ़िर यकायक ही एक साथ ही इनकी वैधानिकता की या सारे के सारे अधिकारों को पा लेने की ललक क्यों ?
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ये समाज के प्रति अचानक ही विरोध क्यों ?क्या समाज ने किसी योजना के तहत ही इन तमाम परंपराओं पर हमेशा के लिए बंदिश लगाने जैसा कुछ कर दिया था ? नहीं बल्कि हकीकत ये है कि आज इस तरह की तमाम पनप रही नई मान्यताएं और परंपराओं को भारतीय समाज में स्थापित कर देने की जो कोशिशें की जा रही हैं वो इसीलिए हैं क्योंकि उन्हें पता है कि आज जो विरोध छिटपुट असंगठित है यदि कल को वो भी एक जगह पर आ गया तो बहुत ही मुश्किल हो जाएगी ।
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समाज को भी सिर्फ़ आंखें मूंद कर और पुरानी संसकृति की दुहाई देते के रुदाली प्रलाप से बाहर निकलते हुए या तो अपने तर्कों से उसे गलत साबित करना होगा नहीं तो फ़िर उसे कम से कम बर्दाश्त करने लायक स्तर पर तो स्वीकार करने के लिए खुद को तैयार करना होगा । आने वाला समय बेहद संवेदनशील और परिवर्तनशील ्होगा ये तय है ।हालांकि ऐसा भी नहीं है कि ये सभी परंपराएं भारत के अलावा सभी देशों में स्थापित हैं और मान्य भी , जद्दोज़हद तो और भी स्थानों व देशों में ज़ारी ही है |

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2 COMMENTS

  1. परम्पराओं का समालोचन होना चाहिए पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि इससे विकृति न फैले समाज में। आज जिन नयी स्थितियों की चर्चा की जाती है, वे बहुत हद तक देह के इर्द-गिर्द घूमती हैं।
    इनका गहन और शोधपरक विश्लेषण और चिंतन होना जरूरी है।

    • हाँ आज इन सब में देह एक बड़ा तत्व बन कर सामने आया है और यही निर्णायक भी सिद्ध होगा

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