वैकल्पिक विधिक उपचार बनाम न्यायिक व्यवस्था

 

Fast Track Courts

देश की तमाम संचालक व्यस्थाओं में आज किसी भी प्रकार से जो व्यवस्था अंततः केंद्र में आ ही जाती है वो है देश की न्यायिक व्यवस्था | अदालतों में न्याय हेतु याचिका दायर कर अपने मुकदमों के  निष्पादन की प्रतीक्षा करते देश के अवाम के लिए अदालतों को आज इससे भी अधिक करना पड़ रहा है | रोज़ सैकड़ों की संख्या में दाख़िल की जा रही जनहित याचिकाओं की बाढ़ से निपटने के अलावा अदालतें खुद भी बहुत बार संवेदनशील मामलों को देखते हुए स्वतः संज्ञान लेकर भी इन मुकदमों की संख्या में इज़ाफ़ा हो जाता है | यही कारण है कि अब प्रतिवर्ष बनाई और स्थापित की जा रही सैकड़ों नई अदालतों के बावजूद भी अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि वो भी निरंतर हो रही है | हालात दिनों दिन विस्फोटक होते जा रहे हैं जिनसे निपटने के लिए कुछ ज्यादा कारगर करना और अभी करना बहुत जरूरी हो गया है |

न्यायिक व्यवस्था में सुधारों की बात चलते ही साढ़े तीन करोड़ से अधिक वादों के निस्तारण की बात सबसे पहले आ जाती है | ऐसा भी नहीं है की खुद सरकार व न्याय प्रशासन ने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया | वास्तव में देखें तो पाते हैं की न्याय की सर्वसुलभता व विवादों के निस्तारण के लिए पिछले दिनों न्याय प्रशासन की ओर से विधिक सेवा व संरक्षण ,मध्यस्थता प्रक्रिया ,लोक अदालत व सांध्यकालीन आदालतें तथा न्याय प्रक्रिया में प्ली बार्गेनिंग व्यवस्था जैसे प्रयगोन को सफलतापूर्वक न सिर्फ अपनाया गया बल्कि इसके परिणाम भी काफी सकारात्मक दिख रहे हैं | इसी को देखते हुए इन प्रयोगों को पूरे देश भर में आगे बढ़ाया जा रहा है |

अदालतों में बढ़ते हुए मुकदमों के बोझ को काम करने के तमाम प्रयासों के बावजूद अदालतें और न्यायाधीशों की संख्या ूत के मुंह में जीरे के सामान ही लग रही है | असल में इसकी बी एक वजह है | अदालतों में मुकदमों की औसत आवक दर उसके निस्तारण की औसत दर से कहीं अधिक है | समाज में बढ़ता बेतहाशा अपराध, सरकार द्वारा विभिन्न विषयों पर बनाए जा रहे नए कानून ,समाचार व प्रसार माध्यमों की सुलभता के कारण इन कानूनों के प्रति आम लोगों की सचेतता व जानकारी तथा प्रति वर्ष देश में अधिवक्ताओं की बढ़ती संख्या आदि ही कुल मिलाकर स्थिति को इस दिशा तक ले आए हैं |

इस परिप्रेक्ष्य में सबसे अहम सवाल ये है कि तो क्या आखिर कभी भी ख़त्म हो पाएगा ए मुकदमों का अम्बार ? क्या आम लोगों को कभी त्वरित न्याय मिल पाने की उम्मीद रखनी चाहिए ? क्या कभी भारतीय न्याय व्यवस्था देश के सभी नागरिकों के साथ एक जैसा व्यवहार कर पाने के अपने तथाकथित आदर्श को सच में ही पा सकेगी ? और ऐसे अनेकों ही क्या आज जनमानस के ,न्यायपालिका पर सालों से बने भरोसे को चुनौती देते से प्रतीत हो रहे हैं |

अब समय आ गया है जब प्रयोगों के इस नए दौर में न्यायिक निस्तरः के अन्य बेहतर और तेज़ विकल्पों पर भी विमर्श किया जाए | विधि क्षेत्र में किए जा रहे शोध व् प्रयोगों में निःसंदेह इन विषयों पर भी काम किया जा रहा होगा | पिछले दिनों एक प्रदेश सरकार ने आम लगों को सरकारी चिकित्सा सेवा को  बनाने के लिए मुहल्ला क्लीनिक नामक छोटी किन्तु सुनियोजित चिकित्सालय सह औषधालय उपलब्ध कराने की पहल की थी जो बहुत ही सफल साबित होती दिख रही है |

विधिक व्यवस्था के शोधकर्ता व परामर्शदाता अब इस दिशा में कार्य  कर रहे हैं लोगों को “मुहल्ला लीगल क्लीनिक” उपलब्ध करवाने ,जहां विवाह ,तलाक ,मध्यस्थता ,मुआवजे का निराकरण ,आपसी लेन देन संबधी विवादों के लिए विधिक उपचार देने हेतु विशेष प्रशिक्षण प्राप्त और पूर्ण विधिक अधिकारिता वाले विशेषज्ञों को न्याय निस्तारण में हिस्सेदारी देकर स्थति में क्रांतिकारी परिवर्तन लेन जैसी योजनाओं को कार्यमूर्त रूप दिया जा सके |

वादी या याची को अपने लिए विधिक उपचार पाने में दूसरी बड़ी बाधा आती है ,मसौदा व प्रस्तुतीकरण | इससे उबरने के लिए विधिज्ञ प्रपत्र आधारित याचिका ,जैसा कि वर्तमान में मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजा या किसी वसूली वाले दीवानी मुक़दमे में प्रचलित है | उदाहरण के लिए जैसे बैंकों में वांछित सूचना भरकर आम जान अपना कार्य कर पाते हैं इसी तरह साधारण प्रपत्रों के आधार पर लोग आसानी से अपने लिए उपचार की मांग कर सकेंगे |

इनके अतिरिक्त विधिक शिक्षा व जागरूकता को जनसाधारण के जाने व समझने के लिए इनका हर स्तर पर प्रसार किया जाए |सरकार  के तमाम सम्प्रेषण संस्थान और समाचार माध्यमों के मार्फ़त नागरिकों को कानूनों का पालन करने ,उनका सम्मान करने ,और अवज्ञा हो जाने पर स्वयं को राज्य द्वारा प्रस्तावित जुर्माने को भरने या उपयुक्त सज़ा के लिए खुद को प्रस्तुत करने जैसे नागरिक संस्कारों के पालन हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए | और इन सबसे अधिक जरूरी है समाज की छोटी इकाई ,ग्राम क्षेत्र में ग्राम पंचायत आदि और शहरी क्षेत्र में स्थानीय कल्याण समितियों को भी , आपसी विवादों झगड़ों को सुलझाने हेतु पहल करने का प्रयास करने का अधिकार प्रदान किए जाने से भी  न्यायिक संस्थानों पर बढ़ते मुकदमे को बोझ करने में सहायता मिल सकेगी |

अंततः यह कहा जा सकता है कि देश और समाज को यदि सच में ही विकास और सृजन के मार्ग पर चलना है तो उसे फिर अपने ही प्रयासों से मुकदमों और विवादों के दुष्चक्र से बाहर निकलना होगा और इसके लिए आज और अभी से गंभीर प्रयास करने होंगे |

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