आखिर क्यों देती है दिल्ली सरकार आतंकियों का साथ

 

कुछ समय पहले तक सिर्फ कांग्रेस और वामपंथी दल और इनके लगुआ भगुआ ही हर आतंकी , देश विरोधी ,कट्टरवादी के पक्ष में अपने आप ही खड़े दिखाई देते थे | अब इनमे एक नया नाम भी जुड़ गया है वो है दिल्ली में सत्ता में बैठी हुई पार्टी आम आदमी पार्टी | चाहे वो देश भर को बुरी तरह जिंझोड़ देने वाले निर्भया बलात्कार काण्ड के आरोपी को फ़ौरन ही सिलाई मशीन देने का फैसला हो | या जवाहर लाल विश्व विद्यालय में देश के विरूद्ध नारे लगा कर बड़ा षड्यंत्र रचने वाले छात्र नेता कन्हैया कुमार के विरूद्ध दायर किए जाने वाले पुलिस के आरोप पत्र को बार बार मंज़ूरी नहीं देने का मामला |

दिल्ली पुलिस ,दिल्ली के राजयपाल , वरिष्ठ अधिकारियों ,शासन प्रशासन के हमेशा ही खिलाफ रहने वाला ये दल ,जिसके सरमायेदारों में से बहुत सारे अब जबकि पुलिस जाँच में खुद आरोपी करार दिए गए हैं तो सरकार और इनके सरपरस्त साथियों ने दिल्ली पुलिस की जांच पर ही सवाल उठा दिया है और किसी अन्य स्वतन्त्र संस्था से दिल्ली के दंगो की जांच कराने की बात कही है |

ताज़ा घटनाक्रम में दिल्ली पुलिस द्वारा अभियोजन पक्ष की तरफ इन दिल्ली दंगों में सरकार और पुलिस का पक्ष रखने के लिए जिन सरकारी अभियोजकों की सूची सरकार के पास भेजी गई है उसे सरकार ने यह कहते हुए खारिज कर दिया है की ये सभी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और निरपेक्ष नहीं रह पाएंगे |

ये कितनी बड़ी और गलत परिपाटी की शुरुआत की गई है इसका अंदाजा भी नहीं है दिल्ली सरकार को | पुलिस को अपने जांच के बाद अदालत में दायर आरोपपत्र में आरोपी पर लगाए गए हर आरोप को संदेह की परे की स्थति तक सिद्ध करना होता है | जांच अधिकारी भी आरोपपत्र दाखिल करने से पहले सरकारी अभियोजकों से ही अंतिम विचार और आदेश लेते हैं |

आरोपी और उनका पक्ष जहां ऐसे गंभीर मुकदमों में तेज़ तर्र्रार अधिवक्ताओं की फ़ौज के साथ अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए उतरेगा तो क्या बदले में दिल्ली पुलिस को इतना भी अधिकार नहीं है कि वो प्रशासन की तरफ ,सरकार और पुलिस की तरफ से सारे विधिक विमर्श को अच्छी तरह रख सके |

कभी कांग्रेस के तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार से अलग “राजनीति का नया चेहरा ” बनने की घोषणा करके सत्ता में आई पार्टी आज खुल्ल्म खुल्ला वो सब कुछ भूल कर सिर्फ और सिर्फ हिन्दू के विरूद्ध खड़ी दीख रही है | यही वो वजह भी रही है है कि कभी , जस्टिस संतोष हेगड़े , किरण बेदी , कुमार विशवास , कपिल मिश्रा जैसी राष्ट्रवादी सोच वाले लोग धीरे धीरे इनसे अलग होते चले गए |

मुख्यमंत्री होते हुए सड़कों पर धरना देने बैठ जाना , जिस पुलिस की सुरक्षा में दिन रात महफूज़ रहते हैं ,मिनट मिनट में उस पर अविश्वास जताना , सार्वजनिक माध्यमों में अपमानित शब्द का प्रयोग करना ,खुद को अनार्किस्ट कहना आदि जैसे व्यवहार को अपनाने वाली ये पार्टी खुद कितनी बड़ी अवसरवादी और तुष्टिकरण की पहरेदार पार्टी बन गई इसे खुद भी नहीं पता चला |

यदि मामला अदालत तक गया जिसकी कि संभावना दिख रही है तो नियमतः दिल्ली पुलिस की ही प्रार्थना को अंतिम स्वीकृति मिलेगी | आजकल वो नारा लगाने वाले नहीं दिख रहे जो अभी कुछ समय पूर्व तक कहते फिर रहे थे : अब होगा न्याय |

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