राजधानी पटना हुई पानी पानी

bihar flood

 

राजधानी पटना आजकल फिर चर्चा में है | हालांकि बिहार में आने वाली प्राकृतिक आपदाएं ,उनसे होने वाली क्षति ,जानमाल का नुकसान और सबसे बढ़कर सरकार और प्रशासन की नाकामी और अदूरदर्शिता की आदत अब पूरे प्रदेश की जनता को हो चुकी है वो भी न जाने कितने बरसों से | अभी कुछ माह पूर्व ही उत्तर बिहार के कुछ जिलों में भारी बारिश और बाढ़ ने भयानक त्रासदी मचाई थी | अभी इससे अच्छी तरह उबरे भी नहीं थे कि अब सिर्फ कुछ दिनों की बारिश ने राज्य की राजधानी को ही पूरा जलमग्न कर दिया है |

इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक स्थिति में कोई विशेष सुधार न तो हुआ है और न ही भविष्य में इसकी बहुत उम्मीद की जानी चाहिए | असल में अपनी विपन्नता ,लोगों का पलायन ,राजनैतिक दरिद्रता व गरीबी ने कुल मिलाकर इस राज्य को अलग थलग सा कर दिया है | बावजूद इसके कि नौकरी ,राजनीति , पत्रकारिता आदि जैसे क्षेत्रों में बिहार निवासियों का पूरे देश भर में कोई सानी नहीं है हर साल बिहार इन प्राकृतिक आपदाओं की त्रासदी को आदतन झेलता और भी भूलता चला जाता है |

और होता भी क्या है ज्यादा ,अपना सब कुछ खो चुके और बिलकुल धरातलहीन होकर बचे खुचे लोग भी विवशतः पूरे देश में खानाबदोशों की तरह निकल पड़ेंगे ट्रेनों में बैठ कर | लेकिन ये इतने भी निरीह नहीं हैं कि ऐसी स्थितियों के लिए इन्हें बिलकुल जिम्मेदारी मुक्त किया जा सकता है विशेषकर तब जबकि इन आपदाओं में सबसे ज्यादा प्रभावित यही तबका होता है जो जमीन से जुड़ा होता है |

इसमें कोई संदेह नहीं कि दशकों में इस तरह से बरसने वाले बादलों ने यदि कहर बरपाने की सोच ली थी तो फिर ऐसे में कोई कितनी भी तैयारी कर लेता होता कमोबेश यही फिर जब मुम्बई नगरपालिका इन बारिशों में हांफने लगती है तो फिर पटना का पानी ही क्यों चर्चा में हो और उस बहाने प्रशासन पर साधा जाने वाला निशाना |

देखिए सवाल प्राकृतिक आपदा के आने उसे रोके जाने या उससे निपटे जाने का अलग है लेकिन उससे अलग एक बिंदु ये है कि आखिर क्या जरूरत है नागरिकों को आम लोगों को फिर सरकार की उसे इतने भारी भरकम करों को देने की जब आप कुछ बुनियादी शर्तें नहीं पूरी कर सकते | जिस तरह से लोग लाचार और हताश तथा असुरक्षित दिखाई दे रहे थे/हैं उसमें तो आपको दिन रात उस बारिश में छाते के नीचे रहकर लोगों के बीच पहुंचकर कठिनाई देखनी बांटनी थी | आप कहते हैं लोगों को धैर्य रखना चाहिए | नतीजा सामने है

अब बात थोड़ी कड़वी जो शायद इस समय उपयुक्त भी नहीं लेकिन फिर अगर अब न कही जाए तो मतलब की भी नहीं ,जिस राज्य में बेटियों में शादी में लाखों रूपये दहेज़ में लिए दिए जाते है अब भी ,मृत्युभोज ,संस्कार आदि के नाम पर आडम्बरों में लाखों रुपये खर्च करने वाला ये समाज आज तक अपना भला नहीं कर सका है तो उसकी कुछ वजहें रही हैं | छोटे छोटे जनप्रतिनिधियों ने यहां बिहार को दीमक की तरह चाटना जारी रखा है | देश को राजनीति में पूरा एक स्कूल बिहार स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स देने वाले राज्य के जनप्रतिनिधियों ने आज तक गंभीरता से अपने गृहराज्य को ही नहीं लिया |

इसका एक बड़ा दुष्परिणाम ये हुआ कि विवश होकर मेधा का इस राज्य से पलयान शुरू हुआ जो होता रहा होता रहा और अब तक हो ही रहा है | बिहार के निवासियों की जीवटता की परिक्षा पहले भी कुदरत लेती रही रही लेकिन हर बार ऐसे समय वो अपने उन खोखले नेताओं की तरफ आस से देखने लगती है जिन्हें चुनने से पहले उन्हें उनकी नीयत का अंदाज़ा होता है |

आप महाशक्ति बनने के दावे ,चाँद को चूमने की हुंकार और बारिश से पूरी राजधानी का बंटाधार जैसे समाचार एक साथ पढ़ भी कैसे सकते हैं। …..सरकार जी आप लोगों से पूछिए उनकी समस्या ,उस समस्या का हल ,और फिर दीजिये उसे ठीक करने का मौका। ….

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