आंदोलन के नाम पर अराजकता और हठधर्मिता : आखिर कब तक

चलिए ,सड़क ,शहर , लालकिले के बाद अब रेल की पटरियों पर आन्दोलनजीवी खेती किए जाने की मुनादी की गई है। संगठनों ने मिल कर सोचा और फैसला किया है तो जाहिर है पहले की तरह ही कुछ बड़ा सोच कर ही किया होगा।

क्यूंकि गणतंत्र दिवस को ट्रैक्टर रैली निकाल कर किसानों की किस समस्या का कौन सा हल निकला ये बताने समझाने के बदले अगले प्रदर्शन , अशांति , विरोध की नियति तय की जा रही है मानो कोई इवेंट मैनेजमेंट चल रहा हो।

और यदि चल भी रहा हो तो हैरानी कैसी ? जब टूल किट मुहैया कराई जा सकती है तो फिर इवेंट को मैनेज क्यों नहीं ? सरकार खुद संसद में एक एक बात स्पष्ट कर रहीहै , और आपकी भी पता है कि सरकार और प्रधानमंत्री की मंशा सिर्फ और सिर्फ जन कल्याण की है। गांव और किसान के प्रति प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि , सोच और उनकी योजनाएं ही बताती हैं कि ये सरकार कभी भी किसानों के अहितकर कोई कानून कभी नहीं बनाएगी।

सरकार अगले 18 महीने तक इस नए संशोधन को पूरी तरह स्थगित करके अच्छे विधिक विकल्पों के लिए वार्ता बातचीत को तैयार है , बार बार न सिर्फ कहा है , बल्कि एक दर्जन बार बैठ कर बही खाते के साथ सब दुरुस्त करने को बैठी है , मगर जब उद्देश्य हठधर्मिता दिखाना है , मीडिया सोशल मीडिया में चेहरा चमकाना और टीवी स्टूडियो में बैठ कर अपनी टीआरपी बढ़वाना हो तो वो फिर आंदोलन बचता ही कहाँ है ??

और असर तो देखिये , शाहीन बाग़ एन्ड कंपनी जी न्यायालय से मांगने कहने गए थे कि हमारे वाले सड़क बंदी में क्या कमी थी हाकिम हमें भी फिर से वही सब। ..हां वही सब करने की परमीसन तो दी ही जाए , अदालत ने मना कर दिया ,ये किस्सा फिर सही। मगर ये सब आखिर रुकेगा कब ? कब लोग समझना शुरू करेंगे की आज के कठिन समय में सबको अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी उठानी होगी। ये मांगने से अधिक देश के लिए अपना देने का समय है।

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