मुस्लिमों का मसीहा बनने के लिए क्यों जरूरी है :हिन्दुओं के विरूद्ध ज़हर उगलना

सड़क पर चलता हुआ एक अदना सा कोई भी ; एक पुलिस अधिकारी को उसका चालान किए जाने को लेकर सार्वजनिक रूप से धमकाते हुए कहता है कि ये वर्तमान सरकार के सत्ता च्युत होते ही वे पुलिस -और अपरोक्ष रूप से सभी क़ानून व्यवस्था और प्रशासन को देख लेगा।

इधर तौकीर राजा , नावेद हसन से लेकर ओवैसी समेत सारे ही नए पुराने फतवा सूरमा एक साथ निकल पड़े हैं इस होड़ में कि कौन मुस्लिमों का सबसे बड़ा मसीहा खुद को साबित कर दे। लेकिन बदकिस्मती से ऐसे दावेदारी ठोंकने वाले तमाम मौलवी , उलेमाओं , अपराधी चरित्र बाहुबलियों से लेकर सफेदपोश राजनेताओं तक में से किसी ने भी मुस्लिम समाज की कठिनाइयों के लिए , लिए , उनकी शैक्षिक स्थिति में आमूल परिवर्तन , महिलाओं को बर्बर बंदिशों से आज़ादी, समाज की मुख्य धारा में सकारात्मक सहभागिता करने जैसी कोई भी एक भी बात इनका कोई लम्बरदार कहने करने को तैयार नहीं है।

हाँ , सरकार हमारी वाली तो अपराध और आतंक से ग्रस्त , दंगों-फसादों ,के चक्रव्यूह में फंसाए रखने वाली पहले जैसी सरकार आएगी तो दिखा देंगे। हमारे लड़कों ने अगर कानों हाथ में लिया तो हिन्दुस्तान का नक्शा बदल जाएगा। हिन्दू को भगाने की जगह नहीं मिलेगी। अगर सारे मुस्लिम एक साथ आ जाएं तो ________ब्ला ब्ला ब्ला।

बस यही ज़हर की दुकानदारी बची रह गई है अब तमाम द्रोहियों के पास। इतिहास में भी जब जब समाज संगठित होकर दृढ़ निश्चय से किसी बड़े परिवर्तन और विकास की ओर अग्रसर हुआ है , लोक कल्याण और राष्ट्रोत्थान के नाम पर अपना हित , स्वार्थ और कोष साधने वालों को खीज स्वाभाविक है।

ये तमाम विष वमनकारी , ये भूल जाते हैं कि अब स्थिति और हालत बिलकुल अलग हैं। ये नया भारत अब कुछ भी और किसी को भी बख्शने को तैयार नहीं है।

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