लालकिले पर ट्रैक्टर स्टंट,धरना स्थल पर बलात्कार -तभी मनाना चाहिए था काला दिवस

इस देश का हाल अजब गजब है , क्यूंकि दुनिया में ये इकलौता अकेला ऐसा देश जहां कोरोना महामारी के कारण लाखों जानों पर प्राणघातक संकट छाया हुआ है , सरकार प्रशासन , अस्पताल डाक्टर पुलिस और खुद आम लोग भी इससे उबरने के लिए दिन रात संघर्ष कर रहे हैं , लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ , राजनीति और पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर ऐसे ही दिन रात , षड्यंत्र रच रहे हैं , चिकित्स्कीय साधनों और संसाधनों की कालाबाज़ारी कर रहे हैं और छद्द्म आंदोलन/प्रदर्शन कर रहे हैं।

सरकार द्वारा किसान बिल में संशोधन के विरोध में , कांग्रेस और भाजपा विरोधी सरकारों की सरपरस्ती और उकसावे में किसानों के नाम पर पिछले कुछ महीनों से राजधानी दिल्ली और उसके आसपास जो भी कुछ किया जा रहा है /किया गया है उससे भी मन नहीं भरा तो रह रह के कुछ दिनों के बाद कुछ न कुछ नया शिगूफा छोड़ दिया जाता है।  इस किसान आंदोलन के तथाकथित अगुआ और नेता जो न तो सरकार से एक दर्जन बार बैठक करने के बाद कोई हल निकास सके और न ही खुद किसी नतीजे पर पहुंचे।

और तो और इस आंदोलन के नाम पर प्रत्यक्षतः अब तक इस धरने में शामिल कई वृद्ध , बीमार लोगों की मौत , लालकिले पर देश को शर्मसार करने वाला टैक्टर स्टंट , पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमले और आख़िरकार प्रदर्शन स्थल पर सामूहिक बलात्कार और ह्त्या जैसे जघन्य अपराधों को कारित करने के बावजूद अब कल यानि 26 मई को काला दिवस मनाने की तैयारी में हैं और इसकी घोषणा भी कर चुके हैं।

सवाल ये है कि जब पहले ही दिन से अपने कुकर्मों और अपराधों के कारण लगातार मुँह काला करवा ही रहे हैं तो फिर काला दिवस मनाने के लिए इतना इंतज़ार क्यों ?? इन्हें तो पहले भी अनेकों बार ऐसे अवसर मिले हैं जहाँ पर अपना काला मुँह , काली नीयत , और काली नज़र के साथ ये काला दिवस मना सकते थे।  खैर देर आयद दुरुस्त आयद।  वैसे भी जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है वैसे ही काली आत्मा वालों को भी सब काला ही काला दिखता है -कानून काला , विरोध करने के लिए ध्वज काला और अब दिवस भी काला।  

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