बचत -एक लघुकथा

 

लीना और टीना शौपिंग मॉल में खरीददारी कर रही थी।

पर्स का दाम सुनकर लीना ने टीना से कान में चुपके से कहा ,  ‘टीना , यार ये तो खुल्लम खुल्ला लूट रहे हैं इस पर्स का बाहर किसी भी दुकान में इससे आधा ही होगा, रहने दे चल निकल यहाँ से। ‘

टीना ने उसे फुसफुसा कर समझाया ,  ‘क्या बोल रही है तू, पागल अब जो है ले ले , ऐसी जगह पर कोई मोल भाव करता है क्या कितनी शर्म आयेगी। ”

सो पर्स खरीद लिया गया ।

मॉल से बाहर निकलते ही दोनों सहेलियां एक रिक्शा करने लगी,

बड़े चौक का कितना लोगे भाई ?

जी मेम साहब दस रुपैये लगेंगे।

अरे जाओ जाओ वहां के तो आठ ही लगते हैं, हम तो रोज़ जाते हैं।

जी बीबीजी, मगर ये भी तो देखिये की कितनी तेज धूप है ।

चलो चलो आठ रूपए में चलना है तो बताओ।

ठीक है बीबीजी, चलिए।

“देखा ये रिक्शे वाले बदमाश होते हैं, बचा लिए न दो रुपैये ” , लीना से टीना ने कहा

इसे कहते हैं -बचत | 

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2 COMMENTS

  1. बहुत बड़ी बचत कर ली। उस मँहगे पर्स में समाएगी भी नहीं।
    बहुत सुन्दर

    • बहुत शुक्रिया और आभार राजा साहब | असल में बात सिर्फ मानसिकता की ही होती है

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